Tuesday 12 November 2019, 09:23 PM
लम्हों ने खता की सदियों ने सजा पाई :1962
By धनश्री जयराम | Bharat Defence Kavach | Publish Date: 6/13/2019 6:56:08 PM
लम्हों ने खता की सदियों ने सजा पाई :1962
कुछ इन हालात में लड़ा था हमारे जवानों ने सन 1962 का युद्ध।

चीन के साथ 1962 की लड़ाई मान-अपमान, कुटिलता, राजनीतिक अदूरदर्शिता व कमजोरी, सेनापतियों के निकम्मेपन, उनके बीच आपसी द्वेष, स्वपोषित अंतरराष्ट्रीय नायक की छवि और छवि के दरकने, भू-राजनीतिक और भू-सामरिक अवयवों की एक ऐसी दास्तान है, जिसने भारतीय जनमानस को पचास साल से उद्वेलित किया हुआ है। एक ओर अपनी वायुसेना के रहते भयभीत राजनीतिक नेतृत्व द्वारा लड़ाई में उसका इस्तेमाल नहीं करना तो दूसरी ओर अपने ही वायुसेनाध्यक्ष एस्पी मारवेन इंजीनियर से सलाह किए बगैर अमेरिका से 12 स्क्वाड्रन स्टार फाइटर (एफ-104) और चार स्क्वाड्रन बी-47 बमवर्षक विमानों की मदद देने की गुहार करना, उस समय के राजनीतिक नेतृत्व की घबराहट और कमजोरी को उजागर करता है। 

उस लड़ाई में सरकारी रिपोर्टों के मुताबिक, भारत के 1383 सैनिक शहीद हुए, 1047 घायल हुए, 1696 लापता हो गए, जबकि 3986 सैनिकोंे को चीन ने बंदी बना लिया। दूसरी ओर, चीन के 722 सैनिक मारे गए और 1697 घायल हुए थे।  इस लेख में हम 1962 की लड़ाई के तमाम पहलुओं पर प्रकाश डाल रहे हैं ताकि पाठकों को एक ही लेख में अपनी तमाम शंकाओं का जवाब मिल सके। यह विस्तृत लेख शोधार्थियों के लिए खास उपयोगी होगा, ऐसी आशा है। -संपादक

            तिब्बत और नेहरू

आजादी के बाद से ही जवाहरलाल नेहरू ने शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का संदेश देना आरंभ कर दिया था। शीतयुद्ध के जवाब में नेहरू ने घोषित किया कि भारत गुटनिरपेक्ष रहेगा। चीन ने 1950 में तिब्बत पर कब्जा कर लिया और यह भारत के लिए एक बड़ा झटका था। इसके बावजूद नेहरू ने चीन के साथ पंचशील समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए। इसके  साथ ही तिब्बत मामले पर भारत अपने सभी अधिकार खो बैठा। तिब्बत को चीन का अंग मान लिया। तिब्बत में यातुंग और ग्यांत्से में संरक्षक (एस्कॉर्ट) के रूप में तैनात भारतीय सेना वापस बुला ली गई और वहां मौजूद भारत सरकार की डाक-तार  सेवा सुविधा बंद कर दी गई ।

उसके स्थान पर चीन की डाक-तार सेवा स्थापित हो गई। चीन में 1945 में सत्तासीन कोउमिंगतांग पार्टी के राष्ट्रपति च्यांग काइ-शेक ने 24 अगस्त 1945 के एक भाषण में घोषणा की थी कि यदि तिब्बती लोग आजादी की मांग करते हैं तो वह तिब्बत को व्यापक स्वायत्तता का दर्जा देने में नहीं झिझकेंगे। बाद में माओ ने भी जब तक भारत, पाकिस्तान और ब्रिटेन जैसे देशों द्वारा पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को मान्यता नहीं दे दी गई, तब तक तिब्बत पर हमला नहीं किया। चीन ने 7 अक्तूबर 1950 को तिब्बत पर पूर्वी और पश्चिमी दिशाओं से हमला कर कब्जा कर लिया। तिब्बतियों के पास इस हमले का सामना करने की क्षमता नहीं थी। अंतत: चीन और तिब्बत के बीच 23 मई 1951 को एक समझौते पर हस्ताक्षर हुए, जिसके तहत चीन को तिब्बत का संरक्षक (सुजरेन) मान लिया गया और चीन ने बदले में तिब्बतियों को गारंटी दी कि उन्हें स्वायत्तता तथा धार्मिक आजादी मिलेगी।  

अंतरराष्ट्रीयवादी होने के नाते नेहरू पर आरोप लगता रहा कि उन्होंने रक्षा तैयारियों की कीमत पर विदेशी मामलों को ज्यादा महत्त्व दिया। यह भी कि वह तिब्बत में चीनी कारगुजारियों के मामले में कुछ ज्यादा ही नरम रहे। जब संयुक्त राष्ट्र संघ में तिब्बत में मानवाधिकार उल्लंघन का मामला उठा तो भारत की ओर से वी.के.कृष्ण मेनन ने तर्क दिया कि उस समय चीन संयुक्त राष्ट्र का सदस्य नहीं था, यह मामला संयुक्त राष्ट्र में नहीं उठाया जा सकता। 

संकेत भांपने में चूका भारत

चीन ने 1950 और 1962 के बीच अपने इरादों के संकेत कई बार दिए , लेकिन नेहरू ने उन्हें नजर अंदाज कर दिया। चीन ने 1956 में ऐसे नक्शे जारी किए, जिनमें लद्दाख के कई भागों को चीन की सीमा में दर्शाया गया था। चीनी प्रधानमंत्री झाउ एनलाई ने 1956 में भारत यात्रा के समय दुरंगी चाल चली। एक ओर चीनी नेता ने मैकमाहोन लाइन को मानने की बात कही तो दूसरी ओर उसी समय लद्दाख के जिन भागों को चीन ने अपना हिस्सा बताया था, उन पर कब्जा करना भी शुरू कर लिया था। वास्तव में चीन ने 1951 से पहले ही लद्दाख के इलाकों में सैनिक गश्त शुरू कर दी थी। 

ए.जी.नूरानी की पुस्तक 'इंडिया-चाइना बाउंड्री प्रॉब्लम: 1846-1947, हिस्ट्री एंड डिप्लोमेसी' में इस मसले पर एक और दृष्टिकोण सामने रखा गया। नूरानी के मुताबिक, भारत ने 1954 में अपने सरकारी नक्शों में एकतरफा बदलाव शुरू कर दिया और भारत द्वारा 1947 और 1950 में प्रस्तुत  नक्शों में जो क्षेत्र सीमांकित नहीं थे, उन्हें सीमांकित कर दिया। रिश्तों में जटिलता तब और गहरा गई, जब 1959 में तिब्बत में चीन के खिलाफ विद्रोह शुरू हो गया और दलाई लामा भारत भाग आए।

विद्रोह को कुचलने के लिए चीन ने अपनी सेना की 54वीं कोर के सैनिकों को तिब्बत भेजा। इससे भी काफी पहले भारतीय सीमा में चीनी घुसपैठ की खबरें आती रही थीं, लेकिन 1959 के बाद का भड़काऊ रवैया और साफ होता गया। चीन इस बात से वाकिफ था कि भारतीय सेना लद्दाख की सीमा पर तैनात होने लगी थी और पूर्वी सीमा पर कोई विवाद भी नहीं था। वहां मैकमाहोन लाइन ही वस्तुत: और कानूनी रूप से सीमा थी। अब चीन ने फैसला किया कि लद्दाख में भारतीय सेना के जमावड़े और साजो-सामान की व्यवस्था को रोकने के लिए पूर्वी सीमा पर विवाद खड़ा किया जाए और अपने सैनिक भेज हथियार और ताकत के बल पर भारतीय सेना को उलझाया जाए। 

चीन ने 1955 में भारत के अक्साई चिन में एक राजमार्ग बनाना शुरू  कर दिया ताकि सिंकियांग और तिब्बत को सामरिक तौर पर जोड़ा जा सके। सड़क के निर्माण का काम 1957 में पूरा हो चुका था,  लेकिन भारतीय खुफिया तंत्र की घोर विफलता के कारण भारत सरकार को इस सड़क के बनने की जानकारी काफी देर से पता चली। यह जानकारी भी सरकार को अखबारों में छपी खबरों से ही मिली थी। लद्दाख के प्रमुख लामा कुशक बकुला ने 1957 में तिब्बत की यात्रा की थी। उन्होंने भी सिंकियांग और तिब्बत के बीच सड़कें बनाए जाने की कई जानकारियां दी। जब चीन भारतीय सीमा में सड़कें  बनाने में व्यस्त था, तब नेहरू भारत-चीन मैत्री की खाम-खयाली में मगन थे। नेहरू ने संसद को आधिकारिक रूप से यह जानकारी अगस्त 1959 में दी। इससे एक वर्ष पहले 1958 में भारत ने टोही दल अक्साई चिन भेजे और इन टोही दलों को तब भारी झटका लगा, जब उन्होंने देखा कि चीन उस इलाके को अपने नियंत्रण में ले चुका है। तिब्बत के मसले ने आग में घी का काम किया और इसी के साथ खत्म हो गया 'हिन्दी-चीनी, भाई-भाई' के नारे का ढकोसला। 

नेहरू-झाउ एनलाई समीकरण

चीनी नेता झाउ एनलाई के 1959 में नेहरू को लिखे खत में चीन ने 50 हजार वर्ग मील क्षेत्र पर अपना दावा ठोंक दिया। सीमा विवाद सुलझाने के लिए बातचीत की शुरुआत नेहरू और झाउ एनलाई के बीच नई दिल्ली में 19-25 अप्रैल 1960 को हुई मुलाकात में हुई। झाउ एनलाई ने प्रस्ताव रखा कि चीन पूर्वोत्तर में मौजूद मैकमाहोन लाइन को स्वीकार कर सकता है, बशर्ते भारत अक्साई चिन समेत पश्चिमी सीमा पर पर चीनी दावे को स्वीकार कर ले। नेहरू ने अगले दिन इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया, लेकिन इस प्रस्ताव पर ऐतिहासिक दस्तावेजों, जानकारियों, नक्शों और सीमा से संबद्ध अन्य सामग्री के आधार पर आगे बातचीत के लिए सहमत हो गए। 

यहां नेहरू से भारी भूल हो गई और सीमा विवाद सुलझाने का एक स्वर्णिम मौका हाथ से जाता रहा। चीनी प्रस्ताव ठुकराते समय भारत को यह समझ लेना चाहिए था कि अब अक्साई चिन को वापस हासिल नहीं किया जा सकता, लिहाजा चीनी प्रस्ताव मान लेना चाहिए था। प्रस्ताव ठुकराने का नतीजा यह निकला कि अक्साई चिन तो हाथ से गया ही, साथ ही पूर्वी मोर्चे पर भी विवाद पैदा हो गया। पचास के दशक में भारत और चीन के बीच मुख्यत: लद्दाख-तिब्बत वाली पश्चिमी सीमा पर असहमति थी और पूर्वी सीमा पर खास विवाद नहीं था। यह तो चीन के साथ युद्ध के बाद साठ के दशक में विवादों की सूची में अरुणाचल प्रदेश का नाम भी जुड़ गया।

चीन की ओर से इस बारे में पेश सबूत काफी सतही थे। विशेषज्ञों ने चीन की 'प्रचलित पारंपरिक सीमा' के तर्क को यह कहते हुए नहीं माना कि सीमाओं का निर्धारण भारत पर अंग्रेजों के शासनकाल में भारत और तिब्बत के बीच हुई संधियों के आधार किया गया है। चीन इन संधियों को अवैध करार देता है। भौगोलिक परिस्थितियां भी भारत के पक्ष में रही हैं, क्योंकि सीमा निर्धारण के जल विभाजक (वॉटरशेड) सिद्धांत को भी माना जाए तो इस सिद्धांत के मुताबिक, 'यदि पहाड़ प्राकृतिक सीमा बनाते हों तो यह तार्किक होगा कि दो देशों के बीच जल विभाजक बनाने वाली पर्वत श्रृंखला का मध्य उस क्षेत्र की सीमा होना चाहिए।' चीन ने इस सिद्धांत को भी मानने से इंकार कर दिया।  युद्ध शुरू होने के एक सप्ताह पहले,  झाउ एनलाई ने भारत की यात्रा की और नेहरू को भरोसा दिया कि चीन किसी भी हालत में भारत पर हमला नहीं करेगा। यह भरोसा सिर्फ एक दिखावा था, क्योंकि हमले के लिए चीन ने महीनों पहले तैयारी कर ली होगी।

भू-राजनैतिक कारक

लोग इस हकीकत को भूल जाते हैं कि इस जंग के लिए जिम्मेदार उस समय की भू-राजनीतिक और भू-सामरिक परिस्थितियां भी थीं। कहा जाता है कि चीनी नेता माओ भारत और अमेरिका के बीच बढ़ते आर्थिक संबंधों को लेकर काफी आशंकित थे। झाउ कहते थे कि भारत 'अमेरिका की बोली बोलता है।' उस दौर में अमेरिका सैन्ट्रल ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन(सैंटो)और साउथ ईस्ट एशियन ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (सीटो) का गठन कर चीन की घेराबंदी में जुटा हुआ था। माओ को जो दूसरी आशंका सता रही थी, वह यह थी कि कहीं ताइवान अमेरिकी मदद से चीन पर हमला न कर दे। ताइवान का सामना करने खड़ी चीनी फौज को माओ ने तभी तिब्बत की ओर रुखसत किया, जब अमेरिका ने यह भरोसा दे दिया कि अमेरिकी ताइवान की ओर से चीन पर हमला नहीं करेगा। 

नेहरू की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रियता के कारण माओ पागलपन की हद तक उनसे नफरत करते थे। नेहरू अफ्रीकी और एशियाई देशों में खास लोकप्रिय थे। यह बात इससे भी स्पष्ट होती है कि 1955 में आयोजित बांदुंग सम्मेलन काफी सफल रहा था। भले ही भारत गुटनिरपेक्ष था, लेकिन चीन फिर भी भारत को मदद दे कर अपनी ओर लाने की जुगत कर रहा था।  पूर्व सोवियत संघ द्वारा भारत को हथियार दिए जाने तथा हिमालय क्षेत्र मंे सड़के बनाने के लिए जरूरी भारी मशीनें उपलब्ध कराए जाने को लेकर भी माओ दबाव महसूस कर रहे थे। सोवियत नेता ख्रुश्चेव भारत के साथ रिश्तों को प्रगाढ़ करने में लगे हुए थे। इसे लेकर चीन और सोवियत संघ के रिश्तों मंे गहरी खाई पैदा हो चुकी थी। इसी दौरान अमेरिका और सोवियत संघ के बीच पैदा हुए क्यूबा मिसाइल संकट ने सोवियत संघ को चीन से करीबी गांठने को मजबूर किया। सोवियत संघ को लगता था कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसे चीन के साथ की जरूरत होगी।

इसके एवज में ख्रुश्चेव ने चीन के मामले में निष्पक्ष रहना मंजूर कर लिया। ख्रुश्चेव, जो पहले कभी नेहरू का साथ दिया करते थे, अब कहने लगे, 'भारत सोवियत संघ का मित्र है, लेकिन चीन हमारा भाई है।' माओ का समर्थन पाने के लिए ख्रुश्चेव भारत के साथ मिग-21 विमानों की बिक्री का सौदा रद्द करने को तैयार हो गए। दस्तावेजों से पता चलता है कि चीन ने यूरोपीय शक्तियों के हाथों सदियों तक हुए अपमान का बदला लेने के लिए यह जंग छेड़ी थी। चीन ने जो शुरुआती कदम उठाए, उनमें भारत को अलग-थलग करने के लिए उसके पड़ोसी देशों के साथ करीबी रिश्ता बनाना शामिल है। ऐसा लगता है जैसे भारत और नेहरू को सबक सिखाने के इरादे से चीन जंग छेड़ रहा था। इस जंग के बहाने वह अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान अपनी ओर खींचना चाहता था। 

भारत की अग्रिम (फॉरवर्ड) नीति: बड़े-बड़े छेद

योजना और तैयारियों के बिना 1961 में शुरू की गई भारत की फॉरवर्ड नीति की भी बार-बार आलोचना हुई। नेहरू ने न तो रक्षा बजट में वृद्धि की और न ही सेनाओं को सशस्त्र युद्ध के लिए तैयार किया। उन्होंने सिर्फ सीमा क्षेत्रों में चौकियां स्थापित करने और जनरल बी.एम.कौल को आर्मी चीफ ऑफ जनरल स्टाफ के पद पर नियुक्त करने का काम किया। इन चौकियों को स्थापित करने का उद्देश्य पूर्वी और पश्चिमी सीमाओं पर तैनात चीनी फौजियों के सप्लाई मार्ग को तोड़ना था। जैसे-जैसे भारत चीन के दावे वाले क्षेत्र के करीब पहुंचता गया, वैसे-वैसे चीन के मन में तिब्बत की ओर भारत की कथित विस्तारवादी नीति को लेकर आशंकाएं मजबूत होने लगी। भारत की इस नीति के कारण चीन ने दावा किया कि भारत उसके क्षेत्र में खुल्लम-खुल्ला अतिक्रमण कर रहा है।   

युद्ध का छिड़ना

चीन ने पूर्वी सीमा पर विवाद खड़ा करने का प्रयास 25 अगस्त 1959 को लोंगजु में किया। इस घटना में चीन ने एक भारतीय पुलिस दल पर फायरिंग कर 14 जवानों को मार डाला। चीन ने कहा कि लोंगजु में सीमा निर्धारित नहीं है, अत: भारतीय पुलिस दल की मौजूदगी सीमा अतिक्रमण की कार्रवाई थी। इसके बाद पश्चिमी सीमा पर लद्दाख में कोगका दर्रे पर चीनियों ने एक और पुलिस दल पर हमला कर जवानों को मार डाला। चीन ने इन दोनों घटनाओं के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराने मंे कोई देरी नहीं की। चीन ने सितंबर 1962 में थांगला रिज के दक्षिणी ढलान पर ढोला में एक सैन्य चौकी स्थापित कर ली।  यह स्थान मैकमाहोन  लाइन के तीन किलोमीटर दक्षिण में है। इसका भारत ने विरोध किया और सेना को चीनियों  से जमीन वापस लेने का आदेश दिया।

कई लोग नेहरू के आदेश के उस अंश को भूल जाते हैं, जिसमें उन्होंने साफ कहा था कि 'सेना तैयार होने पर जमीन खाली कराने की कार्रवाई करंे'। उनके आदेश के इस दूसरे भाग को मीडिया अक्सर गोल कर जाता है। दूसरी ओर, चीन ने मैकमाहोन लाइन की अपनी व्याख्या करते हुए कहा कि उसकी चौकी मैकमाहोन लाइन पर ही है।  जब तक भारतीय फौज विवादित स्थान तक पहुंचती, चीनियों ने नामकाचू नदी के दोनों किनारों पर अपना नियंत्रण जमा लिया था।  चीन ने 20 अक्तूबर को पश्चिमी और पूर्वी मोर्चों पर भारी धावा बोला और 24 अक्तूबर को अपनी स्थिति काफी मजबूत कर लेने के बाद शांति वार्ता की पेशकश की। चीन के शांति प्रस्ताव में शामिल बातें इस तरह थीं-

' दोनों पक्ष हिमालयी सीमा पर वास्तविक नियंत्रण रेखा से 20 किमी. पीछे हटें। 

' दोनों पक्ष वास्तविक नियंत्रण रेखा पार न करें। 

' सीमा विवाद खत्म करने के लिए बातचीत की जाए। 

नेहरू ने फिर एक बार चीनी प्रस्ताव को ठुकरा दिया। उन्होंने कहा वह ऐसे किसी प्रस्ताव को स्वीकार नहीं कर सकते जिसमें कब्जाई गई जमीन पर चीन का हक हो।  नेहरू ने अपनी ओर से प्रस्ताव दिया कि पहले चीन सितंबर 1962 तक कब्जा की गई भारत की जमीन से पीछे हटे।  

अमेरिका से सैन्य मदद की गुहार!

भारत ने नवंबर के आरंभ में अमेरिका और ब्रिटेन से हथियारों की मदद के लिए गुहार की। इस गुहार के बाद मदद की पहली खेप आई। नेहरू ने अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी को खत लिख कर हवाई मदद की भी गुहार की। इससे पहले कि अमेरिका इस पर कोई कदम उठाता, चीन ने एकतरफा युद्ध विराम की घोषणा कर दी। अमेरिका से मदद मांगने के कारण गुटनिरपेक्ष आंदोलन के नेता के रूप में भारत की छवि को भारी धक्का लगा। साथ ही सोवियत संघ के साथ रिश्तों पर भी कुछ बुरा असर पड़ा था। 

चीनी सेना तेजपुर के करीब

चीन की सेना (पीपुल्स लिबरेशन आर्मी) असम में भारत के सीमांत शहर तेजपुर के काफी करीब पहुंच गई थी। तवांग, वालान, से ला, बोमडिला आदि इलाके पहले ही रौंदे जा चुके थे। तेजपुर तक चीनी सेना का पहुंचना, भारत के लिए जबर्दस्त धक्का था और भारतीय सैन्य शक्ति की छवि दागदार हो गई। अपने दावे वाले इलाकों तक चीनी सेना के पहुंचते ही झाउ एनलाई ने 19 नवबंर 1962 को एक तरफा युद्ध विराम की घोषणा कर दी। चीनी सेना न केवल पीछे हट गई, बल्कि मैकमाहोन लाइन के दक्षिण में जिन क्षेत्रों पर कब्जा किया था, वे भी भारत को लौटा दिए। नेहरू ने युद्ध विराम को स्वीकार नहीं किया, लिहाजा तकनीकी तौर पर भारत आज भी चीन से लड़ रहा है। भारत ने नवंबर 1962 को संसद में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया, जिसमें चीन द्वारा काबिज की गई जमीन को खाली कराने की बात कही गई थी। ऐसा हो नहीं सका। 

सेना भौचक रह गई

भारतीय सेना युद्ध के लिए कतई तैयार नहीं थी। वास्तव में, बहुत से सैनिक चीनी सेना की गोलियों से नहीं, बल्कि कठोर ठंड और ताकतवर चीन से लड़ने के लिए झोंक दिए गए थे। वे युद्ध से ज्यादा मौसम की कठोरता के कारण मारे गए। भारतीय सेना को इससे पहले 15 हजार फुट की हिमालय पर्वतमाला की ऊंचाई पर लड़ने का कोई अनुभव नहीं था। कई पल्मोनरी  एडिमा (शीतघात) के शिकार हो गए। संख्या बल में चीनी सेना काफी बड़ी थी और उनके पास भारी तोपें थी। भारत की कुछ ब्रिगेड ही 4400 किमी लंबी सीमा पर मुकाबले में थी, जबकि दुश्मन की सेना तब तक चरम ऊंचाइयों के मौसमी हालात में अभ्यस्त (एक्लाइमेटाइज) हो चुकी थी। भारतीय सेना के पास राशन और गर्म कपड़ों जैसी सामान्य जरूरत की चीजों की भी कमी थी। अग्रिम क्षेत्रों तक पहुंचने के लिए सड़कें तक नहीं थीं।  खच्चरों का इस्तेमाल किया गया। बेतार यंत्रों और हेलीकॉप्टरों की कमी थी। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि सबसे बड़ी कमी नेतृत्व की थी। 

एक रक्षाहीन 'रक्षा मंत्री'

वी.के.कृष्ण मेनन 1957 में भारत के रक्षा मंत्री बने। नेहरू के करीबी होने के साथ-साथ विदेश नीति के गहन अनुभवी होने के कारण उनसे काफी अपेक्षाएं थी। मेनन की कार्यशैली ने उच्च सैन्य व्यवस्था के अधिकारों को बौना कर दिया। यहां तक कि, सैन्य तैयारियों और संक्रियात्मक(ऑपरेशनल) फैसले लेने वाली मंत्रिमंडलीय रक्षा समिति (डीसीसी) की बैठकें बंद कर दी गईं। तीनों सेनाओं के प्रमुखों की चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी से सलाह किए बगैर फॉरवर्ड नीति लागू की जाने लगी। विडंबना  यह कि थलसेना को हवाई सहयोग देने जैसे मुद्दे पर एक बार भी वायुसेना प्रमुख एस्पी मेरवान इंजीनियर को बैठक के लिए रक्षा मंत्रालय नहीं बुलाया गया। 

चीन के एकतरफा युद्ध विराम के मूल कारण

चीन ने चार कारणों से युद्ध विराम की घोषणा की थी। पहला, ठंड का मौसम सिर पर था। बर्फीले पहाड़ों के कठोर वातावरण में लड़ना काफी कठिन था। लिहाजा विजयी मुद्रा में पीछे हट जाने में समझदारी थी। दूसरा, यदि अमेरिका और ब्रिटेन भारत को सैन्य मदद शुरू कर देते तो भारतीय फौज के पास आधुनिक और असरदार साधन तथा हथियार होने के कारण वह मजबूत हो जाती। तीसरा, अंतरराष्ट्रीय समुदाय, विशेषरूप से विकासशील देशों में चीन की बदनामी होती जिनका चीन अगुवा बनना चाहता था। अक्साई चिन पर कब्जे के बाद युद्ध जारी रखने का खास औचित्य नहीं था। 

मेनन और सेना के रिश्तों में तनाव 

मेनन के सेना के साथ संबंध काफी विवादास्पद थे। मेनन और नेहरू ने वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के बीच से कृपा पात्रों को चुनना शुरू कर दिया। चमचा नीति के तहत ही लेफ्टिनेंट जनरल बी.एम. कौल को जनरल स्टाफ बना दिया गया।  कौल ने कभी किसी लड़ाका डिवीजन की कमान नहीं संभाली थी। जबकि पदोन्नति के लिए ऐसा करना अनिवार्य था। उस समय थलसेना अध्यक्ष जनरल के.एस.थिमैया, कौल की इस पदोन्नति के सख्त खिलाफ थे और मेनन के समक्ष अपनी नाराजगी भी जाहिर की थी, लेकिन मेनन टस से मस नहीं हुए। मेनन के आगे झुकने के बजाए,  जनरल थिमैया ने 1959 में पद छोड़ दिया। इससे नेहरू को झटका लगा और नेहरू ने किसी तरह थिमैया को अपना इस्तीफा वापस लेने के लिए मना लिया।

इस्तीफा वापस लेने के बाद थिमैया  को जलील किया गया और अंतत: वह सेवा निवृत्त हो गए।  मेनन इस बात से नाराज थे कि थिमैया  उनकी अनुमति लिए बिना नेहरू से क्यों मिले। थिमैया ने नेहरू से कहा था कि यदि मेनन को रक्षा मंत्री पद से नहीं हटाया गया तो सेना अपना काम ठीक से नहीं कर सकेगी।  थिमैया के स्थान पर नेहरू ने जनरल पी.एन.थापर को थलसेनाध्यक्ष बना दिया। थापर जब पूरी तरह नेहरू के आदेशों का पालन नहीं कर सके तो जनरल कौल को और ताकत दे दी गई और चीफ ऑफ जनरल स्टाफ बना दिया गया। कौल का यह आलम था कि जब सीमा पर युद्ध चरम पर था, तब वह बर्फीली पर्वतीय ठंड से बीमार हो गए और सीमा पर सेना का नेतृत्व करने के स्थान पर दिल्ली में अस्पताल के बिस्तर से सेना का नेतृत्व कर रहे थे। 

जनरल थापर ने सचेत कर दिया था कि चीनी सैनिकों की संख्या और ताकत बहुत ज्यादा है और यदि भारत ने जंग के मैदान में विवाद निपटाने का फैसला किया तो नतीजे काफी घातक होंगे। जनरल थापर की आपत्तियों को ठुकराकर मेनन ने दस सितंबर 1962 को चीनियों को मार खदेड़ने का आदेश दिया। भारतीय सेना को मजबूर हो कर भारतीय क्षेत्र (ढोला) से चीनियों को खदेड़ने के लिए मैदान में उतरना पड़ा। इस दौरान, नेहरू और मेनन रायनयिक यात्राओं पर विदेश चले गए। जनरल थापर राजनीतिक, नौकरशाही और विपक्ष के दबाव में आकर 'जस का तस' आदेश लागू करने को झुक गए।

मेनन ने ले.जनरल एसएसपी थोरट को दरकिनार कर उनसे जूनियर थापर को जनरल बनाया था। मेनन को लगता था कि थोरट, थिमैया के करीबी हैं और थिमैया के साथ उनके मतभेद के समय थोरट ने थिमैया का साथ दिया था। थोरट और थिमैया ने भारतीय क्षेत्र की रक्षा के लिए जो रणनीति बनाई थी, उसे मेनन ने ठुकरा दिया था। सेना की 33 कोर के जनरल ऑफिसर कमांडिंग लेफ्टिनेंट जनरल उमराव सिंह भी घमंडी मेनन का शिकार हुए थे। उमराव सिंह ने मेनन के आदेशों की खुल कर अवहेलना की थी। सैम मानेकशा को भी नहीं बख्शा गया। ये तमाम जनरल मेनन का शिकार इसलिए बने, क्योंकि ये सभी गैर-राजनीतिक और पेशेवर सैनिक थे। विडंबना देखिए कि लड़ाई खत्म होने के बाद नेहरू ने चीनी फौज से बुरी तरह पिटी पूर्वी सेक्टर की सेना की 4 कोर की कमान कौल से छीन कर मानेकशा को थमा दी। 

युद्ध के लिए चीन की तैयारियों के दौर में भी भारतीय सेना ने आसन्न संकट पर राजनीतिक नेतृत्व को पूरी तरह सचेत नहीं किया। सेना ने अपने लिए हथियारों और साजो-सामान की खास मांग पेश नहीं की। सेना का मानना था कि युद्ध हुआ भी तो काफी सीमित होगा। जबकि जनरल थिमैया ने अपने कार्यकाल में 'गहरी रक्षा रणनीति' तैयार की थी और यदि इसे लागू किया जाता तो चीनी घुसपैठ रोकी जा सकती थी। खुफिया तंत्र फेल था और जो भी जानकारियां थी, वे सही व्यक्ति तक नहीं पहुंच रही थी। 

सबक जो सीखे

लड़ाई  में चीन के मुकाबले भारतीय हताहत सैनिकों की संख्या ज्यादा थी। सरकारी रिपोर्टों के मुताबिक, भारत के 1383 सैनिक शहीद हुए, 1047 घायल हुए, 1696 लापता हो गए ,जबकि 3986 सैनिकोे को चीन ने बंदी बना लिया। दूसरी ओर, चीन के 722 सैनिक मारे गए और 1697 घायल हुए थे। लड़ाई के बाद, भारत ने अपनी अग्रिम नीति का परित्याग कर दिया और नेहरू का 'एशियाई भाईचारे' का सपना ध्वस्त हो गया। कृष्ण मेनन ने 30 अक्तूबर को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को रक्षा मंत्री पद से अपना त्यागपत्र भेज दिया। कोलकाता जैसे शहरों पर चीनी हवाई हमले के डर से भारतीय वायुसेना का इस्तेमाल न करना और वायुसेना का इस्तेमाल न करने की भारतीय नेताओं को अमेरिकी राजदूत गैलब्रेथ की सलाह आदि पर लड़ाई के बाद वर्षों तक चर्चा जारी रही। 

हैंडरसन ब्रूक्स-भगत रिपोर्ट 

लड़ाई और लड़ाई में भारत की विफलता के कारणों की जांच के लिए सरकार ने ले.जनरल हेंडरसन ब्रूक्स और ब्रिगेडियर पी.एस.भगत को नियुक्त किया। उनकी रिपोर्ट आज तक सार्वजनिक नहीं की गई। इसका कारण यह बताया गया है कि रिपोर्ट में कुछ अत्यंत संवेदनशील जानकारियां दर्ज हैं जिन्हें सार्वजनिक करना राष्ट्रहित में नहीं है।  

रक्षा तैयारियों में तेजी

चीन के साथ जंग में हार से सबक लेते हुए बाद में भारत ने सेनाओं के आधुनिकीकरण पर खास जोर दिया। सेना में भर्ती बढ़ा दी गई। प्रशिक्षण में बेहतरी लाई गई। इन सब बदलाव का लाभ तीन साल बाद पाकिस्तान के साथ 1965 में हुई जंग में मिला और भारत की जीत हुई।  नेहरू का निजी कूटनीति में गहरा विश्वास था और उन्होंने कभी भी युद्ध को विदेश नीति का औजार नहीं माना। उनका यह विश्वास इस हार में पूरी तरह टूट गया। नेहरू इसके बाद मानसिक आघात से कभी उबर नहीं सके और 1964 में उनका निधन हो गया।  इस हार से भारत ने कई सबक सीखे। पहला, विदेश नीति कभी भी पूरी तरह व्यक्तित्व आधारित नहीं होती।

दूसरा, तुष्टीकरण से समस्या को कुछ समय के लिए ही टाला जा सकता है, तुष्टीकरण समस्या का समाधान नहीं है जैसा कि नेहरू ने पचास के दशक में चीन से टकराव टालने की नीति अपनाते हुए किया। तीसरा, उच्च नेतृत्व को कठोर फैसले लेने के लिए सक्षम होना चाहिए। नेहरू ने यदि झाउ एनलाई के प्रस्ताव को मान लिया होता तो सैंकड़ों जानों को बचाया जा सकता था और हार की जिल्लत से भी बचा जा सकता था। चौथा, सेना में राजनीतिक और नौकरशाही दखलंदाजी नहीं होनी चाहिए। पांचवा, भारत ने इससे पहले चीन के पड़ोसी देशों-जापान, ताइवान आदि से मेलजोल नहीं बढ़ाया था।  इस हार के बाद भारत ने 'लुक ईस्ट' नीति लागू की।

1967 और 1987 की झड़पें

नाथु ला (1967)

चीन ने सिक्किम में घुसने के इरादे से नाथु ला पर कब्जा करने की कोशिश की। तब तक सिक्किम भारत में शामिल नहीं हुआ था। इससे पहले 1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान भी चीन ने सिक्किम पर कब्जा करने की धमकी दी थी, लेकिन बाद में उसने निष्पक्ष रहने का फैसला किया। बहरहाल, भारतीय सेना ने अच्छी तरह अपना सबक सीख लिया था और नाथु ला पर जब चीन ने संघर्ष शुरू किया तो चीनी सेना की अच्छी तरह नाक तोड़ दी गई। चीनी सेना को पीछे हटने के लिए मजबूर होना पड़ा। सिक्किम 26 अप्रैल 1975 को भारत का अंग बन गया। 

सुमद्रोंगचू घाटी संघर्ष (1987)

अगली झड़प अरुणाचल प्रदेश में सुमद्रोंगचू घाटी में 1987 हुई। सन 62 की जंग के बाद पूर्वोत्तर सीमा भारत के लिए प्राथमिकता बन गई। जब इंदिरा गांधी 1980 में दोबारा प्रधानमंत्री बनीं, उन्होंने वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सेना की तैनाती बढ़ाने का फैसला किया। कहा जाता है कि 1962 का युद्ध थांग ला पर भारत द्वारा अविवेकपूर्ण कब्जा किए जाने के कारण हुआ। चीन ने 1962 में तवांग पर कब्जा कर लिया था। सेना का मानना था कि भविष्य में युद्ध के समय तवांग को सुरक्षित रखना महत्त्वपूर्ण होगा, इसलिए हाथुंग ला रिज में तैयारी करनी चाहिए। भारतीय इंटेलिजेंस ब्यूरो की एक टीम 1983 में नामकाचू और न्यामजियांग घाटी के पूर्वोत्तर में स्थित सुमद्रोंगचू घाटी पहुंची। भारत 1984 तक इस घाटी के किनारे एक निरीक्षण चौकी स्थापित कर चुका था।

यहां स्पेशल सिक्योरिटी फोर्स के जवान तैनात किए गए, जो गर्मियों में वहां रहते और सर्दियों में चौकी खाली कर नीचे लौट आते। जब 1986 में 12 असम रेजिमेंट वापस गई तो देखा कि वहां पहले से ही चीनी स्थाई ढांचे बना कर मौजूद थे। जवाब में भारतीय सेना ने सीमा पर अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में गश्त तेज कर दी। भारत ने प्रस्ताव रखा कि यदि चीनी पीछे हटें तो भारतीय सैनिकों को वहां नहीं भेजा जाएगा। लेकिन चीन ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। राजीव गांधी के शासनकाल में जनरल के. सुंदरजी 1986 में थलसेनाध्यक्ष बने। उन्होंने 'ऑपरेशन चेकरबोर्ड' के नाम से एक सैन्य अभ्यास कराया। 

उद्देश्य यह जानना था कि जरूरत पड़ने पर भारत कितनी तेजी से असम में तैनात सैनिकों को भारत-चीन सीमा तक पहुंचा सकता है। बाद में 'ऑपरेशन फॉल्कन' नाम से एक और सैन्य अभ्यास किया गया।भारत ने 5वीं माउंटेन डिविजन की एक पूरी 

ब्रिगेड हेलीकॉप्टरों से घाटी के बिल्कुल करीब जिमथियांग हेलीपैड पर उतार दी। प्रतिक्रिया में चीनी सैनिकों ने वास्तविक नियंत्रण रेखा पर पोजीशन संभालनी शुरू कर दी। दोनों ओर की सेनाएं आमने-सामने थीं। इन दो घटनाओं ने भारतीय फौज की ताकत का लोहा मनवा लिया। फिर राजनयिक दौरे शुरू हो गए। राजीव गांधी 1988 में बीजिंग गए और उनके बाद प्रधानमंत्री बने नरसिम्हा राव के दौर में 1993 में हुए एक समझौते के बाद संबंधों में आया तनाव कम होने लगा।   

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