Tuesday 20 August 2019, 07:22 AM
क्या अरुण प्रकाश की जांबाजी के जवाब में आया था हिन्द महासागर में सातवां बेड़ा!
By पूर्व नौसेनाध्क्ष एडमिरल अरुण प्रकाश | Bharat Defence Kavach | Publish Date: 6/11/2019 4:31:22 PM
क्या अरुण प्रकाश की जांबाजी के जवाब में आया था हिन्द महासागर में सातवां बेड़ा!
नीचे से दूसरी कतार में बाएं से दूसरे हैं नौसेना के लेफ्टिनेंट अरुण प्रकाश अपने वायुसेना साथियों के साथ। अरुण प्रकाश बाद में नौसेना अध्यक्ष बनें।

 पाकिस्तान से हुई 71 की जंग से जुड़ी एक रोचक दास्तान

पाकिस्तान के साथ 1971 के निर्णायक युद्ध से जुड़ी एक ऐसी रोचक घटना,  हम यहां प्रकाशित कर रहे हैं,  जो पूर्व नौसेनाध्क्ष एडमिरल अरु ण प्रकाश की पुस्तक 'क्रोज नेस्ट' (कौव्वे का घोंसला) में दर्ज है। वैसे तो एडमिरल प्रकाश का कहना है कि उन्होंने यह किस्सा हल्के-फुल्के अंदाज में लिखा था, लेकिन हमें लगता है कि इस बात में सचाई हो सकती है, खासतौर से इस घटना पर एक अमेरिकी राजनायिक द्वारा इस्लामाबाद से लिखे विवरण को पढ़कर लगता है कि हंसी-मजाक में लिखी गई इस घटना के पीछे सचाई थी।  

पाठकों को ज्ञात होगा कि उस युद्ध में अमेरिका पूरी तरह पाकिस्तान का साथ दे रहा था। अमेरिका ने पाकिस्तान को उस काल के आधुनिक सैबर जेट लड़ाकू विमानों से तो लैस किया ही था, युद्ध के दौरान एक अमरीकी सुरक्षा सलाहकार संगठन ब्रिगेडियर जनरल चार्ल्स 'चक' यिगर  के नेतृत्व में पाकिस्तानी हवाई रणनीति बनाने में सहायता और पाकिस्तानी पायलटों को आदेश और सलाह दे रहा था।  इतना ही नहीं, पाकिस्तान को समर्थन देने के इरादे से अमेरिका ने भारत के खिलाफ परमाणु विमानवाही पोत यूएसएस एंटरप्राइज के नेतृत्व में अपना सातवां बेड़ा भी बंगाल की खाड़ी में भेज दिया था। कहने को तो यह बेड़ा पूर्वी पाकिस्तान में मौजूद अमेरिकी नागरिकों को सुरक्षित निकालने के बहाने भेजा गया था। इसका असली मकसद था, भारत को सावधान करना कि वह पश्चिमी पाकिस्तान पर नजर न डाले और अगर जरुरत पड़े तो भारतीय सेना से घिरी पाकिस्तानी फौज को सुरक्षित पश्चिमी पाकिस्तान भेजा जा सके। 

अरुण प्रकाश ने पाक के चकलाला हवाई अड्डे पर इसी हंटर विमान से हमला किया था। अब यह विमान वायु सेना के कलईकुंडा स्टेशन में है। 

 

लेकिन अब संभव दिखता है कि इस बेड़े को भेजने के पीछे अन्य कारणों के बीच एक कारण यह भी हो सकता था कि अरु ण प्रकाश ने पश्चिमी पाकिस्तान स्थित चकलाला पाकिस्तान एयरफोर्स के बेस पर खड़े कुछ विमानों को ध्वस्त कर दिया था, जिनमें से एक उस अमेरिकी पायलट ब्रिगेडियर जनरल 'चक' यिगर का भी था, जो परले दर्जे का हेकड़ीबाज और बड़बोला था। अपना विमान नष्ट होने के बाद उसने यह दावा किया था कि भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने चुन कर उसका विमान नष्ट करने का आदेश दिया था। इस घटना के बाद पाकिस्तान स्थित अमेरिकी दूतावास ने पेंटागन को भारत के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने को लिखा और लगता है तब सातवां बेड़ा रवाना किया गया। - संपादक

एडमिरल अरुण प्रकाश के शब्दों में...

यह बात साठ के दशक के उत्तरार्ध की है, जब मैं नौसेना में लेफ्टिनेंट था और पहले विमानवाही पोत आईएनएस विक्र ांत के डेक से सी-हॉक लड़ाकू विमान उड़ाता था। एक दिन मुझे आदेश मिला कि मुझे एक्सचेंज पोस्टिंग के तहत भारतीय वायुसेना के साथ दो साल काम करना है। न चाहते हुए भी मैं गोवा (नौसेना अड्डा) छोड़ उत्तर भारत के लिए निकल पड़ा। वायुसेना में मुझे दूसरी पीढ़ी के ब्रिटेन में बने हंटर लड़ाकू विमान उड़ाने का प्रशिक्षण मिला और 1970 के अंत में दिल्ली के करीब हिंडन वायुसेना अड्डे पर तैनात कर दिया गया। इस बीच मैं छुट्टियां बिताने विदेश चला गया और लौटने पर देखा कि मेरा स्क्वाड्रन देश के और उत्तर की और पठानकोट हवाई बेस पर जंग की तैयारी में तैनात किया गया था? मैं स्क्वाड्रन में पहुंचा जो पाकिस्तान सीमा के केवल 12 मील करीब था। 

युद्ध का होना अनिवार्य हो गया था। शुक्र वार 3 दिसंबर की शाम 5.40 बजे रेडियो से खबर मिली कि पाकिस्तान एयर फोर्स ने पूरे तालमेल के साथ भारत के नौ पश्चिमी वायुसेना अड्डों पर हमला किया है। उसी रात प्रधानमंत्री ने रेडियो पर घोषणा की कि पाकिस्तान के साथ लड़ाई शुरू हो गई है। 

सन 1971 के मध्य से ही किसी भी पूर्णिमा के आस-पास दुश्मन के अचानक हमलों की आशंका से वायुसेना के विमानों को हर महीने चांद निकलने से पहले सीमा से दूर अंदर ले जाया जाता था। उस दिन भी हम सीमा से दूर कहीं थे। पाकिस्तानी हमले के बाद रात को हमें अपने अड्डे पठानकोट वापस पहुंचने का आदेश मिला। सर्दियों की रात थी, 4 दिसंबर को भोर के समय 5.30 बजे घना कोहरा था। कोहरे के हालात में ही विमान में सवार हुए।  मेरे कुछ साथी कोहरे में रनवे से भटके भी, लेकिन हम 500 फीट की ऊंचाई पर उड़ते हुए 45 मिनट में अपने अड्डे पर पहुंच गए। अब भी अंधेरा था। हाथ-मुंह धोया, कुछ खाया तब तक विमान में ईंधन भरा जा रहा था और हथियार लगाए जा रहे थे। 

सभी पायलटों को अलग-अलग लक्ष्य दिए गए और जैसे ही मैं अपने हवाई जहाज की ओर निकला तो मैंने देखा की मेरे बॉस विंग कमांडर (बाद में एयर वाइस मार्शल) सी. वी. पारकर  मेरे आगे पेशावर हवाई अड्डे पर हमले के लिए निकल पड़े थे।  

मुझे और मेरे साथी फ्लाइंग ऑफिसर कराम्बया को चकलाला हवाई बेस पर हमला करने का आदेश मिला और हम पाकिस्तान की नई राजधानी इस्लामाबाद के पास इस बेस पर हमले के लिए निकल पड़े। चकलाला की सीधी दूरी तो ज्यादा नहीं थी, लेकिन हमने पाकिस्तानी रडार्स की नजर से बचने के लिए पहाड़ों के पीछे से उड़ान भरने का लंबा रास्ता चुना। कुछ क्षणों में स्थिर होने पर हमने नक्शों, गति यंत्र, कंपास और स्टॉप वाच पर ध्यान केंद्रित किया। (उस दौर में ऐसे ही मार्गदर्शी यंत्र उपलब्ध थे!) जब हम लक्ष्य तक पहुंचे तो कोहरे ने यहां भी पीछा नहीं छोड़ा। किसी तरह हमने चकलाला अड्डे पर नजर गड़ाई। कोहरे के बीच मुझे एक ऊंचा टावर नजर आया। लगा यह पाकिस्तानी अड्डे का एटीसी टावर (हवाई यातायात नियंत्रण कक्ष) है और अच्छा टारगेट है। अपने विमान की चार तोपों से मैंने हमला किया और ऊपर से देखा कि टारगेट से पानी का सैलाब निकला। मालूम हुआ, अरे! यह तो पानी की टंकी थी, लेकिन दिल को तसल्ली दी कि चलो, पाकिस्तानी वायुसेना के लोग आज प्यासे तो रहेंगे! 

पाकिस्तान का चकलाला हवाई अड्डा

 

अब मैंने और गहराई से महत्त्वपूर्ण लक्ष्य तलाशने शुरू कर दिए। देखा आम के पेड़ों के बीच छुपा कर रखा गया पाकिस्तान का एक बड़ा सा हर्क्यूलिस सी-130 परिवहन विमान खड़ा है। उसका पिछला भाग और डैने नजर आ रहे थे। मैंने 30 एमएम के गोलों की बौछार कर दी और टारगेट से धुंआ उठने लगा। मेरा साथी पायलट दुश्मन के विमानों पर नजर रखे हुए था। उसे अब लगा कि हम जरूरत से ज्यादा देर तक दुश्मन की सीमा में रु के हुए हैं। उसने लौटने की हिदायत दी। 

इस बीच दूसरा गोता लगाते हुए मैंने कुछ छोटे परिवहन विमान खड़े देखे, जो सेकेंडरी रनवे पर खड़े थे। इस बीच दुश्मन ने हम दोनों के ऊपर विमान भेदी तोपों और मशीन गानों से लाल रंग का ट्रेसर फायर शुरू कर दिया। इसकी परवाह न करते हुए मैंने उन खड़े विमानों पर धावा बोल दिया। अब मेरे साथी का धैर्य जवाब देने लगा और उसने रेडियो सेट पर चिल्लाते हुए वापस लौटने को कहा। हमने विमान के इंजन को पूरा दम दिया और चकलाला छोड़ घर की दिशा में लौट चले। हमारी तोपें खाली हो चुकी थीं, लेकिन वापसी में सौभाग्य से हमारा सामना दुश्मन के किसी विमान से नहीं हुआ और हम सुरक्षित लौट आए। हम खुश थे कि हमने पाकिस्तान को उसकी हरकतों का माकूल जवाब दे दिया। 

लौट कर 'डीब्रीफिंग' (कार्रवाई के बाद की रिपोर्ट) में मैंने जानकारी देते हुए  जो कहा-

सी-130 विमान को ध्वस्त करने की कार्रवाई पर ज्यादा जोर दिया। छोटे विमानों के बारे में सरसरी जानकारी दी और पानी की टंकी उड़ाने की कार्रवाई को गोल कर गया। उस शाम पाकिस्तान रेडियो ने संयुक्त राष्ट्र के विमान पर भारतीय वायुसेना के हमले की कड़ी शिकायत की।  हमने इसे पाकिस्तानी दुष्प्रचार मानते हुए ध्यान नहीं दिया। लेकिन मेरा बॉस कई महीनों तक 'निहत्थे मध्यस्थ' पर भारतीय नौसेना के हमले का जिक्र  कर मुझे छेड़ता रहा। (अरु ण प्रकाश भारतीय नौसेना से ही भारतीय वायुसेना में भेजे गए थे। -सं) 

अब आता है कहानी में नया मोड़

अरुण प्रकाश के शब्दों में...

इस युद्ध को बीते कई साल हो गए। एक शाम मुझे एक उड्डयन संवाददाता ने 'वॉशिंगटन' मासिक  पत्रिका में अक्तूबर 1985 में छपे एक लेख की प्रति भेजी। लेख का शीर्षक था, 'दि राइट स्टफ एट दि रॉन्ग प्लेस'। इसे लिखा था अमेरिकी राजनियक अडवर्ड सी. इंग्राहम ने। 

वह इस्लामाबाद स्थित अमेरिकी राजदूत जोसफ फार्लैंड के राजनीतिक सलाहकार थे और उसी दौर में ब्रिगेडियर जनरल यिगर (जिसका ऊपर जिक्र  किया गया है), मिलिट्री असिस्टेंस अडवाइजरी ग्रुप (एमएएजी) के मुखिया था। चूंकि यह लेख 'चक' यिगर पर और 1971 की घटना पर केंद्रित था, लिहाजा मैंने इसे गौर और  दिलचस्पी से पढ़ा। लेख पढ़नेे के पीछे क्या कारण था, यह आपको आगे पता चलेगा। यहां मैं यह साफ करना चाहता हूं कि जो विचार और टिप्पणियां मैं बता रहा हूं, वे पूरी तरह इंग्राहम की हैं। यहां साफ करना चाहता हूं कि मैं यिगर का पूरी तरह सम्मान करता हूं। 

'सन 1971 में, इंग्राहम लिखता है, 'यिगर पाकिस्तान की नई राजधानी इस्लामाबाद में एमएएजी का मुखिया बन कर आया। उसके साथ चार अधिकारी और दर्जन भर कर्मचारियों का दल था, जिनका काम था कि पाकिस्तान को मिल रही फौजी मदद का समान तरीके से वितरण करना। उसका यह काम था कि वह पाकिस्तानियों को बताए कि किस तरह खुद की जान गंवाए बिना अमेरिकी सैन्य सामग्री का इस्तेमाल किया जाए। यह काम ज्यादा कठिन इसलिए भी नहीं था, क्योंकि पाकिस्तानी सेनाएं काफी हद तक सधी हुई थी।

अपने साथियों के साथ मध्य में पूर्व नौसेनाध्क्ष एडमिरल अरुण प्रकाश

 

वह आगे लिखते हैं, यिगर को अमरीकी सरकार ने दो इंजनों वाला एक बीचक्राफ्ट नामक विमान भी दिया गया था। पेंटागन ने यह विमान उसे इसलिए दिया था कि वह अमेरिका द्वारा दी गई सैन्य सामग्री पर यहां-वहां नजर रख सके। उधर, अमेरिकी राजदूत को मछली मारने का शौक था, उसे यह विमान इसलिए भाने लगा, क्योंकि यिगर पाकिस्तान में दूर- दराज की झीलों और नदियों तक मछली के शिकार के लिए राजदूत को अपने बीचक्र ाफ्ट में ले जाया करता था।' इंग्राहम ने लिखा, 'पूर्वी पाकिस्तान में हालात बिगड़ रहे थे, हम दूतावास में बिगड़ते हालात को लेकर काफी व्यस्त रहते थे। 

बैठकों का दौर बढ़ता जा रहा था और तनाव का माहौल रहता था। मुझे याद है, एक दिन राजदूत फार्लैंड ने यिगर से पूछा कि यदि युद्ध पूरी तरह छिड़ जाता है तो वह क्या सोचता है कि पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना कितने दिनों तक भारत के हमले के आगे टिक सकती है'?, यिगर ने जवाब दिया, 'हम भारतीय सेना का एक महीने तक मुकाबला कर सकते हैं, लेकिन इसके आगे बाहरी मदद के बिना उन्हें रोकना संभव नहीं होगा।' जवाब सुन कर सभी लोग चौंके। उसे यह बात समझ में नहीं आई कि यह 'हम' अमेरिका नहीं, पाकिस्तान था। 

पाकिस्तान के शुरु आती हमले की अगली सुबह यिगर ने भारत के खिलाफ युद्ध में निजी तौर पर भाग लेना शुरू कर दिया। पाकिस्तान ने हमले से पहले समझदारी दिखाते हुए अपने विमानों को भारतीय सीमा से दूर छिपा दिया था। लेकिन किसी ने भी यिगर को उसके विमान के लिए  नहीं चेताया, क्योंकि जब एक भारतीय पायलट ने पाकिस्तानी विमान भेदी तोपों के हमलों को चकमा दे कर वायुसेना अड्डे पर हमला किया तो वहां उसे दो छोटे विमान खड़े दिखे, जिनमें से एक यिगर का था, जिसे उसने सुरक्षित स्थान पर नहीं भेजा और भारतीय पायलट ने उनको नष्ट कर दिया।

दूसरा छोटा विमान संयुक्त राष्ट्र का था, जिसका इस्तेमाल कश्मीर में नियंत्रण रेखा पर निगरानी करने वालों तक सप्लाई पहुंचाने के लिए किया जाता था। इंग्राहम आगे लिखता है, 'मुझे यह तो पता नहीं कि संयुक्त राष्ट्र ने अपने विमान के नष्ट होने की इस घटना पर क्या प्रतिक्रि या दी, लेकिन यिगर की प्रतिक्रि या काफी कड़वाहट भरी थी। दूतावास में वह चिल्लाता रहा और दावा करता रहा कि भारतीय पायलट को न सिर्फ अच्छी तरह पता था कि वह क्या कर रहा है, बल्कि इंदिरा गांधी ने खास आदेश दिया था कि यिगर के विमान को ध्वस्त किया जाए।' बाद में अपनी पुस्तक में उसने लिखा था कि अंकल सैम (अमेरिका) को 'उंगली' करने का यह था भारतीय तरीका!

इंग्राहम ने आगे चुटकी लेते हुए लिखा, 'भारत की इस ज्यादती(!) पर हमारा जवाब वॉशिंगटन को भेजा गया उच्च प्राथमिकता वाला एक टेलीग्राम था। इसमेंं दूतावास की ओर से लिखा गया था कि भारत ने जानबूझ कर अमेरिका के खिलाफ यह करतूत की है और इसका तुरंत प्रतिकार किया जाना चाहिए। 

यिगर की बाद में युद्ध के दौरान गतिविधियां अनिश्चित रही। एक पाकिस्तानी व्यापारी के बेटे ने मुझे बताया था कि यिगर पेशावर वायुसेना अड्डे पर रहा और भारत के खिलाफ पाकिस्तानी वायुसेना की कार्रवाई को निजी तौर पर निर्देशित करता रहा। एक अन्य व्यक्ति ने बताया कि उसने पेशावर अड्डे पर उतरे एक लड़ाकू विमान से यिगर को उतरते हुए देखा था।'

अरुण प्रकाश का निष्कर्ष 

अरुण प्रकाश लिखते हैं, 'इंग्राहम का यह लेख पढ़ा और बाद में जब मैं नौसेना से सेवानिवृत हुआ, तब यह विचार अक्सर मेरे जेहन में आता रहा है कि काश श्रीमती गांधी ने सचमुच  यिगर के विमान को ध्वस्त करने का निर्देश दिया होता। और यदि इंदिरा गांधी ने निजी तौर पर यिगर के बीचक्र ाफ्ट को नष्ट करने का कोई ऐसा आदेश दिया होता तो यह बात भी जायज होती कि अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन स्वयं 'तुरंत जवाबी कार्रवाई' के तहत अमेरिकी एंटरप्राइज बेड़े को हिन्द महासागर में जाने का आदेश देते। तब इसका 'श्रेय' दोनों के बीच बंटता और मैं किसी और से तो नहीं, सिर्फ संयुक्त राष्ट्र महासचिव से ही माफी मांगने की बात सोचता!'

(क्रोज नेस्ट (कौव्वे का घोंसला) किसी समुद्री जहाज के उस ऊंचे स्थान को कहा जाता है, जहां बैठ कर नाविक समुद्र में दूर-दूर तक नजर रखते हैं और खतरा देखने पर घंटी बजा कर नीचे नाविकों को सतर्क करते हैं। जिन पाठकों ने टाइटेनिक फिल्म देखी है, उनको पता होगा कि जब टाइटेनिक जहाज बर्फीलेे चट्टान से टकराने वाला होता है तो ऊपर बैठे नाविक घंटी बजा कर हिम चट्टान से टकराने की चेतावनी देते हैं। पुराने जमाने में नौका के ऊंचे मास्तूल पर एक घोंसला सा बना कर नाविक उसमें बैठा करते थे। यही वजह है कि इस स्थान को 'कौव्वे का घांेसला' यानी 'क्र ोज नेस्ट' कहा जाता है।  पाठकों को यह जानकर खुशी होगी कि एडमिरल अरु ण प्रकाश हिन्दी के अच्छे जानकार हैं। इस लेख की अनुवादित प्रति जब उन्हें भेजी गई तो उन्होंने स्वयं हिन्दी में ही कुछ सुधार कर इसे प्रकाशन के लिए वापस भेजा। हिन्दी के प्रति उनके लगाव पर हम उन्हें बधाई देते हैं।)  -संपादक 

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पाकिस्तान,राजनयिक,इस्लामाबाद,कौव्वे का घोंसला,पायलटों,एडमिरल अरुण प्रकाश

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