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उन्नीसवीं सदी की भारतीय फौजें
By मृणाल पाण्डे | Bharat Defence Kavach | Publish Date: 6/11/2019 4:24:23 PM
उन्नीसवीं सदी की भारतीय फौजें

लड़ाइयाँ सिर्फ देशभक्ति के जुनून से नहीं जीती जातीं, उसमें वह समूह जीतता है जो चुस्त, अनुशासित और रणनीति बना कर लड़े, वह नहीं जो देशभक्ति के जुनून में लड़ाई में कूद तो पड़े लेकिन बिना तैयारी, बिना एक कुशल नेता के। यह दु:खद सचाई 1857 के गदर के ब्योरों से साफ उभर कर सामने आती है। 

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि उन्नीसवीं सदी में गदर से पहले भारत में धड़ाधड़ विस्तार कर रही ईस्ट इंडिया कंपनी के बड़े लाट (गवर्नर जनरल) की ताकत के दो बडे स्रोत थे : सिविल सर्विस और आर्मी। सिविल सर्विस में जहाँ गोरों को ही रखा गया था , वहीं कंपनी की फौज का बड़ा हिस्सा भारतीय सिपाहियों का था। नियमित और पर्याप्त तनख्वाह, अच्छी खुराक, उम्दा बंदूकें और तिस पर कंपनी की शान का ठप्पा-इनका आकर्षण किसान परिवारों के नौजवानों को फौज की तरफ खींच लाता था। 

अठारहवीं सदी तक कंपनी की फौजें दिखावटी अधिक थीं, और सरकार बहादुर के रसूख की धाक जमाने के लिये,  लाट साहब या कलक्टर साहिब को प्रदर्शनकारी तरीके से सलामी दिलाने और शहरों की सड़कों पर नागरिकों को सरकारी ताकत से सहमाने के लिये मार्च करती हुई टुकडियों की शक्ल में भेजी जाती थीं।  पर एंग्लो-फ्रांसीसी युद्ध में मद्रास यूरोपियन रेजिमेंट के बेहतरीन प्रदर्शन के बाद आर्मी की संख्या और शस्त्रास्त्रों की क्षमता तेजी से बढ़ाई जाने लगी। गदर के कुछ पहले तक बारुदी बंदूकों की जगह एनफील्ड की नई रायफलें आ गईं, जिनकी क्षमता की काफी सराहना होने लगी। 1857 तक सैनिकों की तादाद 2 लाख 38 हज.ार तक चली गई थी।  इसमें कुलजमा 38 हजार अंग्रेज थे, शेष हिंदुस्तानी। अलबत्ता अफसरों का चयन अक्सर अंग्रेज.ी खेमे से ही किया जाता था, या खास शाही (ब्रिटिश) फौजों से।

अंग्रेज.ी फौजों की तुलना में देसी राजाओं, नवाबों और दिल्ली के बादशाह के पास जो फौजें थीं, उनकी कुल तादाद कहीं अधिक थी। लेकिन कई सैनिकों के निजी पराक्रम के बावजूद सामूहिक रूप से युद्ध जीतने वाली मशीन, यह सेनायें कतई नहीं रह गईं थीं। इस वजह की बाबत इस युग के एक देसी साक्षी, सूबेदार सीताराम पाण्डे ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि अंग्रेजी सेना की तुलना में देसी फौजें ढीली-ढाली और अनुशासनहीन थीं। ... 'हिंदुस्तानी फौज में जनरल या अफसर मारा जाये तो पूरी फौज में अफरातफरी मच जाती है। वे मैदान छोड़ कर भाग जाते हैं, दूसरे अफसर की बात नहीं मानते। ...राजा और नवाब अक्सर अपने फायदे के लिये लड़ते हैं। लूट का माल अपने खज.ाने में भर लेते हैं।  कुछ ही राजा अपनी फौज को नियम से पैसा देते हैं। ...सिपाही के मरने पर पेंशन नहीं देते। ...कंपनी के अफसर लड़ते हैं, पर लूटपाट के मकसद से नहीं, उनकी फौज के नियम इतने कड़े हैं कि ऐसा हो ही नहीं सकता।'

गदर के समय तक अंग्रेज शासकों की धारणा बन गई थी कि 'उनके' सैनिक उनके खिलाफ हिंसा नहीं कर सकते। गदर की घटनाओं ने उनको पुनर्विचार को बाध्य किया। अलबत्ता गदर के बाद फौज के पुनर्गठन को लेकर भी सूबेदार सीताराम का मानना था कि अनुशासन बढ़ा देने से कई आरामतलब युवा लोगों को कोफ्त होने लगी थी। लंबी-लंबी छुट्टियों पर गाँव जाने के आदी युवकों को अब न सिर्फ छुट्टी नहीं मिलती थी, बल्कि तरक्की का आधार भी चापलूसी की बजाए नियम कानून और ड्रिल बन जाने से उनके सुविधा पसंद जीवन में खलल पड़ता था।  इसमें शक नहीं कि सैनिक चाहे जितना भी उचाट होते हों, ईस्ट इंडिया कंपनी ने एक पतनशील समय में ड्रिल और चुस्ती के मानक और नये नियमानुशासन लागू कर युवा सैनिकों को लड़ने के काबिल बनाया। 

इन चुस्त देसी सैनिकों की मौजूदगी से कंपनी की सेना 19वीं सदी के भारत में देश की सबसे बेहतरीन सेना बन गई थी। अलबत्ता उनमें से अधिकतर जवान फौरी तौर से जुड़े मर्सीनरी कोटि के थे, और उनमें आज के फौजियों की तरह अपनी रेजिमेंट की या राष्ट्रीय पहचान को लेकर कोई गर्व और एकजुटता का भाव नहीं था। सिपाहियों के बीच उनकी जातीय अस्मिता तमाम ट्रेनिंग के बावजूद, उनकी पहचान बनी रही और छुआछूत भी जारी रही। उस समय भारतीय सामंतों के बीच चूँकि जातिवादी आग्रह साफ और प्रबल थे, और वे खुद भी क्षुद्र इलाकाई स्वार्थों के तहत अक्सर बेवजह भिड़ते रहते थे, वे अपनी सेनाओं को एकजुटता देने या गदर के समय उनकी कोई क्षेत्रीय या वृहत्तर राष्ट्रीय पहचान बनाने में असफल रहे। 

उस समय के एक प्रसिद्ध मराठी यात्रा वृत्त 'माझा प्रवास' में दर्ज गदर के विवरण और 'गदर के फूल' पुस्तक में गदर के दिनों की यादें जमा कर रहे लेखक अमृतलाल नागर को अवध के ग्रामीण इलाके से जो कहानियाँ मिलीं, उनसे स्पष्ट है कि अधिकतर छोटे राजे-रजवाड़ों की सेनायें फौरी तौर पर भर्ती जवानों से बनाई जाती थीं। वे अधिकतर अनपढ़ खेतिहर घरों से आते थे, जिनके बाप-दादा ने जमींदार विशेष या राजा साहिब का नमक खाया होता था। यही उनकी स्वामिभक्ति का पर्याप्त प्रमाण माना जाता था। साल भर यह युवक घर पर खेती करते रहते थे।  बस बीच में त्योहार आदि पर दो-तीन बार राजा साहिब की गढ़ी या किले पर आकर सालाना परेड और कवायद आदि कर जाते थे। 

कवायद का यह कि अधिकतर जवान अनपढ़ होते थे, सो दाहिना- बायाँ भी उनको समझ नहीं आता था।  लिहाज.ा कई जगह उनके टखनों में से एक पर फूल और दूसरे पर पत्ती चिन्हित कर दी जाती थी और मार्च करने के लिये उनको लेफ्ट राइट या दायाँ-बायाँ की बजाए 'फूल पत्ती, फूल पत्ती' कह कर कवायद सिखाई जाती थी। वह भी साल में कुछ ही दिन। 

यदि लड़ाई छिड़ी तो उनके लिये हाँका पड़ता था। और वे जैसे बैठे होते, वैसे के वैसे अपने पुराने-धुराने हथियार सहित आ जाते थे। उनकी स्वामिभक्ति अपने राजा के लिये होती थी, फौजी टुकड़ी व कमांडर के प्रति नहीं। अपने पक्ष के जीतने पर वे अक्सर दबंग हुड़दंगी बन जाते थे और पराजित खेमे में घुस कर खूब लूटपाट करते थे। पर उनका अपना राजा या लीडर के घायल होते ही भाग कर वापस वे अपने अपने गाँव आ खेती में लग जाते थे। हमारे सैनिकों की यह कमज.ोरियाँ जन्मजात नहीं, बल्कि हमारे सामंती राज-समाज के क्षरण की उपज थीं। 

अंग्रेज.ी सेना में भर्ती हो कर सही ट्रेनिंग और हथियार पा कर इन्हीं युवकों ने भारत ही नहीं, बाहर देशों में लड़ी लड़ाइयों में भी गजब की क्षमता का प्रदर्शन किया।  लगभग हर ब्रिटिश कमांडर ने भारतीय सैनिकों की अपने स्वामी के लिये अटूट स्वामिभक्ति और कैंप में उनके अच्छे चाल चलन की तारीफ की है।

पर साथ ही वे यह भी जोड़ते हैं कि भारतीय सैनिक अपनी  'इज्जत' में कोई ठेस लगने से उखड़ जाते हैं और धर्म तथा जाति को लेकर अतिरिक्त तौर से सजग रहते हैं।  सन 1857 में कारतूसों की चर्बी को लेकर जो विद्रोह हुआ, उसके पीछे भी अधिकतर सवर्ण और धार्मिक तौर से कट्टरपंथी घरों के हिंदूू-मुसलमान सैनिकों की यह धारणा थी कि इसमें गाय व सुअर की चर्बी जानबूझ कर उनका धरम भ्रष्ट करने को लगवाई गई है। 

अचरज नहीं कि अंग्रेजों ने 1857 के बाद फौज का जब पुनर्गठन किया तो इस बात पर खास सतर्कता बरती कि सवर्णों की बजाए अवर्णों की अधिक भर्ती हो और उनको क्षेत्रीय पहचान दी जाए।  यह शर्मनाक है कि इतनी गहरी देशभक्ति और समर्पित नेताओं के बावजूद भारतीय विद्रोही सैनिक गण गदर में मुट्ठीभर अंग्रेजों से जीत न सके। अमृतलाल नागर के शब्दों में उस समय संगठन भी था, पर फूट शंका और पारस्परिक डर भी। हमारे वे सत्तावनी सैनिक पुरखे  ऐतिहासिक परिस्थितियों को लेकर गंभीर भले हों, संगठन को लेकर लापरवाह रहे, ''यानी कि हम बढ़ भी रहे थे , बड़ी धूम थी , जोश था। पर साथ ही पैरों में उलझनों की काँटेदार बेडि़याँ भी पड़ी थीं।  हम एक जगह जड़ बने हुए थे।''  

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लड़ाइयाँ,देशभक्ति,अनुशासित,सिपाहियों,भारतीय,ईस्ट इंडिया कंपनी

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