Tuesday 17 September 2019, 05:50 PM
छाताधारी सैनिक: दुश्मन के घर सेंध
By ग्रुप कैप्टेन अशोक कुमार चोर्डिया (सेनि) | Bharat Defence Kavach | Publish Date: 5/30/2019 11:04:12 AM
छाताधारी सैनिक: दुश्मन के घर सेंध

वह योद्धा जो 50 पाउंड वजन और असले के साथ दुश्मन की सीमा में गहरे आसमान से छंलाग लगा कर उतरता है वह कोई कमजोर योद्धा नहीं होगा। - ले.जनरल वीलियम पी योर्बोरो

जंग के मैदान में आकाश से सैनिक और हथियार पहुंचाने के तरीके उस काल से जारी हैं जब लोग किसी उड़ते विमान को चकित हो कर देखा करते थे। वास्तव में आसमान से छतरी से कूदने का काम तो विमान बनने से पहले ही शुरू हो गया था। माना जाता है कि चीन के लोग 11वीं सदी में मजबूत छातों की मदद से ऊंचाई से कूदने का खेल खेला करते थे। लेकिन दस्वावेजी सबूतों के अभाव में इस बात की पुष्टि नहीं हो सकी।

उस काल से सभी तरह की हवाई छतरियां एक ही तरह की थीं लेकिन पहले विश्व युद्ध के समय ही छतरियों का एक मानक बन सका। लियोनार्डो डी विंसी ने पिरामिडनुमा चौकोर पैराशूट की परिकल्पना की थी जो एक सख्त फ्रेम से बना था। ऐसा लगता है कि उस जमाने के उत्साही लोग आकाश से सीधे नीचे उतरने (लंबवत उतरने) और क्षैतिज (हारिजेन्टल) उड़ान के बीच तालमेल नहीं बैठा पा रहे थे। उन्होंने परिंदों के उड़ने की नकल करने की कोशिश तो की लेकिन सेमल रूई के फाहों के गिरने की नकल नहीं की। पैराशूट सेमल रूई की तरह धीरे-धीरे नीचे आने के लिए होता है। 

फ्रांस के आंद्रे जेक्स गोर्नेनिन सही मायने में पैराशूट बनाने वाले पहले व्यक्ति थे। आंद्रे ने पेरिस शहर पर 2000 फुट ऊपर से छलांग लगाई। सन 1802 में उसने रेशम से बनी छतरी के सहारे लंदन पर छलांग लगाई। उस जमाने में ऊंचाई से छलांग लगाने के लिए गर्म हवा के गुब्बारों का इस्तेमाल किया जाता था। उन दिनों हवाई छलांग मौज मस्ती के लिए लगाई जाती थी। सेना में हवाई छलांग तब लगाई जाती थी जब दुश्मन के इलाके पर नजर रखने के लिए गर्म हवा के गुब्बारे में बैठा सैनिक संकट में हो। बाद में खराब हो चुके विमान के पायलट या सैनिक छतरियों के सहारे दुश्मन के इलाके में उतरने लगे। 

स्टैटिकलाइन से कॉम्बैट फ्री फॉल तक 

पुराने पैराशूट स्टैटिकलाइन से संचालित होते थे। आज भी उसी बुनियादी सिद्धांत पर पैराशूट काम करते हैं। इसके तहत पैराट्रुपर के शरीर पर पैराशूट बाँधा जाता है और उसे करीब 16 फुट लम्बी स्टैटिकलाइन डोरी से एक मजबूत स्थान पर जोड़ा जाता है। यह आमतौर पर हवाई जहाज में एंकर केबल होता है। जब जम्पर हवाई जहाज से बाहर कूदता है तो स्टैटिकलाइन पूरी तरह खिंचती है और छाते को पैराशूट पैक से बाहर निकाल देती है। आमतौर पर 200 से 250 किमी प्रति घंटा की रफ्तार से उड़ते विमान से जमीन से तकरीबन 1250 फुट की ऊँचाई से जम्प लगाई जाती है। पैराशूट को खुलने में करीब दो सेकंड का समय लगता है। जैसे ही पैराशूट खुलता है पैराट्रुपर उपलब्ध हवा के सहारे पर होता है। संयोग से कभी स्टैटिकलाइन पैराट्रुपर से कटती नहीं है तो वह कठपुतली की तरह हवाई जहाज से लटका रह जाता है। ऐसा बहुत कम होता है।

त्रिशंकु बन जाना

जब जम्प लागने वाले की स्टैटिकलाइन उसके पैराशूट से अलग नहीं होती तो हैंग-अप यानी त्रिशंकु की स्थिति पैदा हो जाती है। जम्पर हवाई जहाज से लटका रह जाता है। ऐसा स्टैटिकलाइन के गलत जोड़ के कारण हो सकता है। हालांकि इस व्यवस्था में चेक और बैलेंस इतने होते हैं कि इस गलती का रह जाना बहुत कम संभव है। एक और वजह यह हो सकती है कि जम्प लगाते समय सैनिक के शरीर या उपकरण से स्टैटिकलाइन उलझ जाए। हैंग-अप का पता लगते ही हवाई जहाज पर मौजूद डिस्पैचर फौरन जम्पर की स्टैटिकलाइन से दो पैराशूट जोड़ते हैं और एंकर केबल को काट देते हैं।

इसके कारण लटके हुए छाताधारी सैनिक दो छातों के सहारे नीचे उतरता है। शांतिकाल में विमान ऊपर चक्कर लगाता रहता है और पैराट्रुपर को ट्रेनिंग ड्रॉप जोन में उतारा जाता है। पर युद्ध की स्थिति में यह संभव नहीं। 11 दिसंबर 1971 को बंग्लादेश के युद्ध में महादेव गौरव नाम का सैनिक ऐसे ही एक पैकेट विमान से लटक गया। डिस्पैचरों ने फौरन र्कारवाई की और उसे सावधानी से रिलीज किया। फिर भी वह 13 मिनट तक संकट में फँसा रहा और जब उसका पैराशूट खुला महादेव अपने साथियों से 80 किलोमीटर दूर जा चुका था। वह एक छोटे से तालाब में सुरक्षित उतर गया। उसका भाग्य अच्छा था कि वह मुक्ति वाहिनी के बीच उतरा, रज़ाकारों के बीच नहीं। 

वैनमॉर्क, नॉर्वे में हेवी वॉटर प्लांट पर तोड़फोड़ (1943)- दूसरे विश्व युद्ध के एक साहसिक खुफिया अभियान में छाताधारी सैनिकों को उतार कर यूरोप के एकमात्र बड़ी तादाद में हेवी वॉटर तैयार करने वाले कारखाने को ध्वस्त किया गया। माना जाता है कि इस कार्रवाई के कारण जर्मनी का एटम बम बनाने का कार्यक्रम सफल नहीं हो पाया। 

चिकित्सा सहायता के लिए पैराड्रॉप- अगस्त 1943 में चीन-बर्मा सीमा पर एक क्षतिग्रस्त सी-46 विमान से 21 लोगों ने बेलआउट किया। उस सुदूर इलाके में मदद पहुँचाने का एकमात्र तरीका था पैराड्रॉपिंग। लेफ्टिनेंट कर्नल डॉन फ्लेकिंजर और उनके साथ मेडिकल कोर के दो जवानों ने इस काम के लिए खुद को वॉलंटियर किया। मेडिकल कोर के इन जांबाजों के सफल पैराड्रॉप के बाद एक नए संगठन की बुनियाद पड़ी जिसका नाम है पैरारैस्क्यू।

पैराड्रॉपिंग के सहारे राजनयिक दबाव- 4 जून 1987 को भारतीय वायु सेना ने जाफना में रसद गिराई (ऑपरेशन पूमलाई)। मिराज विमानों की छाया में पाँच एएन-32 विमानों के फॉर्मेशन ने रसद से ज्यादा श्रीलंका सरकार को एक गंभीर संदेश दिया कि तमिलों के खिलाफ कार्रवाई बंद करो और एक राजनीतिक समझौता करो। मीडिया ने इसे ब्रैड बॉम्बिंग का नाम दिया। जाफना का घेरा जल्द हटा लिया गया और राजीव गांधी और जेआर जयवर्धने के बीच समझौता हुआ। 

नवोन्मेष- नीचे उतरते छाताधारी सैनिक जमीन पर मौजूद दुश्मन की सेना के लिए आसान निशाना होते हैं। क्रीट में (मई 1941) नीचे उतरते या उतर कर अपने उपकरणों और वाहनों को तलाशते भारी संख्या में जर्मन सैनिकों की मौत हुई। उतरते फौजियों की सुरक्षा के लिए रूसियों ने सैनिकों के साथ आर्मर्ड परसोनेल कैरियरों को भी उतारने का परीक्षण किया। इन वाहनों में रॉकेट तैनात थे। इन वाहनों का इस्तेमाल नीचे उतर कर फौरन हो सकता है। छाताधारी सैनिक जमीन पर उतरने के बाद सेकंडों के भीतर कार्रवाई कर सकते हैं।  

लम्बे समय तक यह माना जाता रहा था कि इनसान आसमान से गिरते समय रास्ते में ही मर जाएगा। यह गलतफहमी तब दूर हुई जब एक दुर्घटनाग्रस्त विमान का चालक तकरीबन 2000 फुट के फ्रीफॉल के बाद अपने पैराशूट को खोल पाया। उसे रिपकॉर्ड हैंडल खोजने में देर लगी। इसके बाद के प्रयोगों में देखा गया कि आसमान में फ्री फॉल सम्भव है। फ्री फॉल जम्प में जम्पर हवाई जहाज से कूदता है और 120 से 200 मील प्रति घंटा की रफ्तार से नीचे गिरता है और एक निश्चित ऊँचाई पर जाकर अपने पैराशूट को मैनुअली खोलता है।

कॉम्बैट फ्री फॉल (सीएफएफ) जम्प के लिए इस्तेमाल होने वाले रैम एयर पैराशूट सैनिक को शत्रु की निगाहों से दूर रखने में मदद करते हैं। अब यह सम्भव है कि सी-130जे सुपर हरक्यूलिस विमान पर सवार एक सुसज्जित टीम अक्षरधाम मंदिर के ऊपर जम्प लगाए और राष्ट्रपति भवन के पास विजय चौक में रखे एक रुमाल के ऊपर उतर जाए। काफी ऊँचाई से छलांग लगाकर छतरी की ओट में छिपकर मीलों तक की यात्रा करने की इस तकनीक को हाई अल्टीट्यूड, हाई ओपनिंग (एचएएचओ) कहा जाता है। 'नो ईजी डे' के लेखक मार्क ओवेन के अनुसार लुक-छिपकर किसी लक्ष्य तक पहुँचने का सबसे अच्छा तरीका है एचएएचओ। पैराड्रॉप एक साध्य का साधन मात्र है। असली कार्रवाई पैराट्रुपर के सुरक्षित ज़मीन पर उतर जाने के बाद होती है। हवा में हजारों फुट की यात्रा के बाद आखिरी कुछ इंच सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण होते हैं। 

हवाई उड़ानों की गाथा

ब्रिगेडियर जनरल बिली माइकल ने पहले विश्वयुद्ध के दौरान दुश्मन के इलाके में छाताधारी सैनिक उतारने का सुझाव दिया था। पैराशूटों, हवाई जहाजों और प्रशिक्षित सैनिकों की कमी के कारण उनके सुझाव को लागू नहीं किया जा सका। दूसरे विश्व युद्ध के बाद सैन एंटोनियो, टैक्सास में हुए एक प्रदर्शन में एक बमवर्षक विमान से छह छाताधारी सैनिकों ने छलांग लगाई। वे सुरक्षित उतरने में सफल रहे। विमान से छलांग लगाने के बाद तीन मिनट से भी कम समय में वे अपने हथियारों को असेम्बल करके कार्रवाई करने को तैयार हो गए। लेकिन अमेरिकी अधिकारी इस बात से बहुत संतुष्ट नहीं हुए और उन्होंने इस अवधारणा को कुछ समय के लिए टाल दिया। 

पैराड्रॉपिंग की संभावनाओं ने सोवियत और जर्मन सेनाधिकारियों का ध्यान खींचा। सबसे पहले पैराड्रॉपिंग को जमीनी सेना की कार्रवाइयों का हिस्सा बनाया सोवियत सेना ने। उन्होंेने पैराशूटिंग को क्रीड़ा के रूप में अपनाया और लोगों को एयरबोर्न कोर में शामिल होने को प्रोत्साहित किया। उन्होंने सन 1928 तक पहली पैराशूट यूनिट तैयार कर ली और 1933 में सैनिकों और एक युद्धक टैंक को पैराड्रॉप करके दिखाया। सन 1935 में उन्होंने कीव में छाताधारी सैनिकों की दो बटालियनों को उतारा। 1935 की गर्मियों में उन्होंने एक हजार सैनिकों को पैरा-ड्रॉप किया। सितंबर-अक्तूबर 1936 में उन्होंने मिंस्क में 1200 और मास्को में 5200 छाताधारी सैनिक उतारे। सोवियत उदाहरणों ने ब्रिटिश, जर्मन और फ्रांसीसी सेनाओं का उत्साह बढ़ाया। ब्रिटिश सेना ने 1936 में छाताधारी सेना का गठन किया और उसका इस्तेमाल जारी रखा। जर्मन और फ्रांसीसी सेना ने भी छाताधारी दस्ते बना लिए। 

दूसरे विश्वयुद्ध में पैराड्रॉपिंग ने गतिशीलता को एक नया अर्थ दिया। आकाश मार्ग से सेना के कूच करने के शुरुआती जर्मन इस्तेमाल के अच्छे परिणाम मिले। पर सफलता की गारंटी नहीं थी। उन्हें क्रीट(ऑपरेशन मर्करी) में भारी नुकसान हुआ। जर्मन सेना के जो 13,000 सैनिक उस द्वीप में उतरे, उनमें से 5140 हताहत हुए। 350 विमान गिरा दिए गए। क्रीट में जर्मनी की विनाशकारी विजय को युद्धरत दोनों पक्ष अलग-अलग तरीके से देखते हैं। हिटलर के विचार से पैराड्रॉपिंग खर्चीली रणनीति है, जिसका समय निकल गया। मित्र राष्ट्रों की धारणा थी कि इस ऑपरेशन ने एक महत्त्वपूर्ण रणनीति को स्थापित किया। जर्मन सेना ने तकरीबन 100 मील दूर तक फैले ब्रिटेन के नियंत्रण वाले सागर के ऊपर से छलांग लगाते हुए अपने से ज्यादा बड़ी सेना के नियंत्रण को खत्म करते हुए क्रीट पर कब्जा कर लिया। जर्मन सेना द्वारा 'लो कंट्रीज' (पूर्वोत्तर यूरोप के हॉलैंड, बेल्जियम और लक्जेमबर्ग) और क्रीट पर सफल आक्रमणों के बाद ब्रिटेन और अमेरिका को जल्द से जल्द छाताधारी सेना तैयार करने को प्रेरित किया।

छाताधारी सेना का इस्तेमाल करने के पीछे का दर्शन यह है कि या तो उसे उचित समय पर मदद पहुँचाई जाए या उनका काम पूरा होते ही उन्हें वापस बुला लिया जाए। यह मान लिया गया था कि छोटे-छोटे छाताधारी सैनिक दस्ते दुश्मन के भीतरी इलाकों में घुसकर विध्वंस का काम करेंगे। आकाश से बमबारी के अलावा, उन्हें अपनी ज़मीनी सेना के साथ सम्पर्क होने तक, तोपखाने की मदद नहीं मिल सकेगी। परिणामत: सफल छाताधारी अभियान के लिए एयर सुपीरियॉरिटी एक बुनियादी जरूरत बन गई। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान छाताधारी ऑपरेशनों में इसी सिद्धांत को माना गया। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद भी छाताधारी सेना के बाबत प्रयोग चलते रहे। अलबत्ता परिवहन विमानों, पैराशूटों और प्रशिक्षित सैनिकों की कमी हमेशा आड़े आई। 

यह भी सही है कि छाताधारी सेना ने तेज और दुश्मन को आश्चर्य में डालने वाले ऑपरेशन का विकल्प तैयार कर दिया था। सन 1944 की गर्मियों तक अमेरिकी सेना ने दर्जनों ऑपरेशनों में छाताधारी सेना का इस्तेमाल किया। कम्बाइंड एंग्लो-अमेरिकन छाताधारी सेना ने सिसली (जुलाई 1943), नॉर्मेंडी (जून 1944) और राइन नदी पार (मार्च 1945) धावा बोला। उत्तरी अफ्रीका(1942) में छोटे स्तर पर सेना उतारी गई। हालांकि सोवियत संघ ने इसमें पहल ली थी, पर दूसरे विश्व युद्ध में इसका इस्तेमाल ज्यादा नहीं किया। उन्होंने केवल रसद गिराने और कभी-कभार छापामार कार्रवाई के लिए फौजियों को उतारने तक खुद को सीमित रखा। 

भारत: देर से शुरुआत

भौगोलिक रूप से भारत यूरोप से दूर था। इसलिए इसे ट्रेनिंग के लिए आदर्श जगह माना गया। फिर भी यह काम साधनों की कमी के कारण काफी समय तक रुका रहा। सन 1941 में युद्ध कार्यालय ने 2500 छाताधारी सैनिकों को ट्रेनिंग देने के काम को स्वीकृति दी। इस प्रकार दिल्ली छावनी में 50(1) पैरा ब्रिगेड के मुख्यालय की बुनियाद पड़ी। एयर हेडक्वार्टर्स के अधीन एक एयरलैंडिंग स्कूल स्थापित हुआ। शुरू में पूरे देश की सैनिक यूनिटों से वॉलंटियर रिक्रूट किए गए। ज्यादातर वॉलंटियर पैराट्रुपर बनने के उत्साह में शामिल हुए। 

इंग्लैंड से आए प्रशिक्षक अपने साथ 14 पैराशूट लेकर आए। केवल दो (बाद में इनकी संख्या पाँच हो गई) वाइकर्स वैलेंसिया विमान जिन्हें अपनी शक्लो-सूरत के कारण 'फ्लाइंग पिग्स' कहा जाता था, पैरा ट्रेनिंग के लिए दिए गए। अपनी धीमी गति (85 से 90 मील प्रति घंटा) के कारण वे जम्पिंग की ट्रेनिंग के लिए उपयुक्त पाए गए थे। फ्लाइट लेफ्टिनेंट ब्रेरेटन और कैप्टेन एबट और हॉपकिंस ने 15 अक्तूबर, 1941 को पहला टेस्ट जम्प लगाया। तीनों हवा में भटक कर रनवे की कठोर सतह पर उतरे और घायल हो गए। पैरा ड्रॉप ट्रेनिंग ने आसपास की सिविलियन आबादी के मनोरंजन का काम किया। बाद में सैनिकों को 10 किलोमीटर की कच्ची सड़क की यात्रा से बचाने के लिए विलिंग एरोड्रोम में ट्रेनिंग शुरू हुई।  

शुरू में पैराशूटों की कमी के कारण ट्रेनिंग काफी धीमी रही। प्रसिद्ध अमेरिकन पैराशूट निर्माता लेस्ली एल इरविन ने कानपुर में पैराशूट फैक्ट्री स्थापित करने मंे मदद की। यहाँ हर महीने 300 पैराशूट बनाए जा सकते थे। इससे ट्रेनिंग में तेजी आई। आकाश मार्ग के प्रबंधन में दिक्कतों और दिल्ली के आसपास उचित ड्रॉप जोन की उपलब्धता को लेकर अधिकारियों ने पैरा ट्रेनिंग का काम चकलाला (अब पाकिस्तान में) ले जाने का फैसला किया। स्वतंत्रता के बाद पैराट्रुपर ट्रेनिंग स्कूल (पीटीएस), 50(1) पैरा ब्रिगेड और पैराशूट रेजिमेंट ट्रेनिंग स्कूल की आगरा में स्थापना हुई। पीटीएस का काफी अच्छा सेफ्टी रिकॉर्ड है। भारतीय पैराट्रुपर्स ने तमाम जगह अपने कारनामों से वाहवाही लूटी है। यहाँ 1971 के भारत-पाक युद्ध का एक एयरबोर्न ऑपरेशन उल्लेखनीय है।

टंगैल का पैराड्रॉप (दिसंबर 1971) 

टंगैल पैराड्रॉप के लिए 11 दिसंबर 1971 की रात तय की गई। समय से पहले ही एयर सुपीरियॉरिटी हासिल हो जाने के कारण यह अभियान इसके कुछ पहले यानी दिन में 4.00 बजे करने का फैसला किया गया। इसके लिए एएन-12, पैकेट (सी-119), डकोटा (सी-47) और कैरिबू विमानों का इस्तेमाल करने की योजना बनाई गई। काफी संख्या में छाताधारी सैनिक ऐसे थे, जिन्होंने इससे पहले कैरिबू और डकोटा से छलांग नहीं लगाई थी। इसलिए तय किया गया कि कैरिबू का इस्तेमाल न किया जाए। इस विमान का इस्तेमाल गलतफहमी पैदा करने के लिए अलग-अलग जगहों पर डमी गिराने के काम में किया गया। जो सैनिक डकोटा से नहीं कूदे थे उनकी ट्रेनिंग के लिए फौरन पीटीएस तैयार किया गया।  सैनिकों के हौसले ऊँचे थे। 2 पैरा के सभी सैनिकों ने, जिनमें वे भी शामिल थे, जिन्होंने पैरा बेसिक कोर्स भी नहीं किया था, खुद को वॉलंटियर किया। जो क्वालिफाइड पैराट्रुपर नहीं थे, उनमें से केवल दो को, एक सेकंड लेफ्टिनेंट एलजेएस गिल, जिन्हें उन्हीं दिनों कमीशन मिला था और एक अन्य सैनिक को जम्प की अनुमति मिली।

वायु सेना ने 748 छाताधारी सैनिकों को उतारा, जिन्होंने भागती पाकिस्तानी सेना का पीछा किया और टंगैल पर कब्जा किया। इस हमले के कारण उत्तर की ओर ढाका जाने वाला मार्ग काट दिया गया। पाकिस्तानी सेना को रक्षा के लिए एकत्र होने का मौका नहीं मिला और अंतत: उसे समर्पण करना पड़ा। इस प्रकार इस छाताधारी अभियान ने एक नए देश को जन्म दिया।  टंगैल पैराड्रॉप का एक दिलचस्प पहलू यह है कि हालांकि 748 सैनिक उतारे गए थे, पर मीडिया ने इनकी संख्या 5000 मान ली और इस जानकारी के कारण पाकस्तिानी सेना का मनोबल पूरी तरह टूट गया।   

भविष्य

एयरलिफ्ट प्लेटफॉमोंर् को दुश्मन के एयर डिफेंस तोपखाने, मिसाइलों और लड़ाकू विमानों का खतरा होता है। मई 1954 में इंडो-चाइना में दिएन बिएन फू पर कब्जे के लिए अपनी सेना की सहायता करने की कोशिश में फ्रांस के 62 विमानों की तबाही इस बात को रेखांकित करती है। इस प्रकार के नुकसान भविष्य में पैराड्रॉप ऑपरेशनों की सार्थकता पर सवालिया निशान लगाते हैं। वे इस जोखिम को दूर करने की जरूरत को भी रेखांकित करते हैं। इसमें छिपना, हवा का रुख अपने पक्ष में करना और सुरक्षा के लिए लड़ाकू विमानों की मदद लेना शामिल है। इस प्रकार के खतरों की वजह से दुश्मन के क्षेत्र में बड़ी संख्या में परिवहन विमानों और हेलीकॉप्टरों को ले जाना काफी मुश्किल काम बन गया है, पर इस प्रकार बड़ी तादाद में सैनिकों को उतारने की रणनीति को नकारा भी नहीं जा सकता। पैराड्रॉप अभियान अब भी चलाए जाते हैं। मार्च 2003 में इराक के उत्तरी मोर्चे पर कार्रवाई के दौरान अमेरिकी थलसेना को तुर्की की सरकार ने रास्ते देने से इनकार कर दिया। 

ऐसे में तुर्की के बंदरगाह पर पहुँचे अमेरिकी सैनिकों को पन्द्रह सी-17 विमानों ने बीस भारी प्लेटफॉमोंर् और 959 सैनिकों को इराक के बशूर ड्रॉप जोन में उतार कर उत्तरी मोर्चे को तैयार किया। यह बात बड़ी संख्या में सैनिकों और उनके उपकरणों को एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाने की जरूरत को रेखांकित करती है। 

ग्रुप कैप्टेन अशोक कुमार चोर्डिया (सेनि)

(लेखक पूर्व पैराशूट जंप इंस्ट्रक्टर (पीजेआई) रहे हैं और वायु सेना कमांडो गरुड़ रेजिमेंटल ट्रेनिंग सेंटर के कमांडेंट के अलावा वायु सेना मुख्यालय में सहायक निदेशक आपरेशंस भी रहे। उन्होंने मालदीव में 1988 में ऑपरेशन कैक्टस में पीजेआई दल का नेतृत्व भी किया।) 

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छाताधारी,सैनिक,दुश्मन,50 पाउंड,हथियार,हारिजेन्टल,गुब्बारों,स्टैटिकलाइन

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