Thursday 27 June 2019, 05:34 AM
रक्षा जरूरतों की पूर्ति के लिए घरेलू उत्पादों का उठाया जाए लाभ
By डॉ.आर.के.त्यागी | Bharat Defence Kavach | Publish Date: 5/17/2019 3:13:40 PM
रक्षा जरूरतों की पूर्ति के लिए घरेलू उत्पादों का उठाया जाए लाभ

'मेक इन इंडिया' की सफलता के नुस्खे

भारत 2014 से 2018 के बीच रक्षा सामग्री का आयात करने वाला दूसरा सबसे बड़ा आयातक देश था। यह स्थिति तब है जब कई दशकों से रक्षा के क्षेत्र में आत्म-निर्भरता हासिल करने के प्रयास हो रहे हैं। पिछले कई वर्षों में कई ठोस काम हुए-रक्षा उत्पादन विभाग ने रक्षा उत्पादन गलियारों, नवोन्मेष और प्रौद्योगिकी विकास केन्द्रों की स्थापना के अलावा संशोधित मेक-2 प्रक्रिया, मिशन ज्ञान शक्ति, रक्षा निवेशक सेल और थर्ड पार्टी निरीक्षण जैसे उपाय किए। 

ऐसा रक्षा निर्यात प्रक्रियाओं को दुरुस्त करने तथा छोटे और मझोले उपक्रमों को आत्मनिर्भरता के काम में योगदान देने के लिए प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से किया गया। देश में कई रक्षा उत्पादों का उत्पादन प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के जरिए हो रहा है। देखें तो 2017-18 में भारत में रक्षा उत्पादन 70 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा रहा। इसमें रक्षा उपक्रमों और आयुध कारखानों की भागीदारी 58 हजार 183 करोड़ रुपये की रही। 
 
रक्षा सेनाओं में भारतीय नौसेना का स्वदेशीकरण पर जोर उल्लेखनीय है। सत्तर के दशक में आईएनएस नीलगिरी जंगी पोत का देश में निर्माण हुआ था। तब से अब तक हमारे अधिकतर युद्धपोत और पनडुब्बियां देश में ही बन रही हैं। लेकिन भारतीय वायुसेना और थलसेना की अधिकतर रक्षा सामग्रियों का विदेशी कंपनियों से आयात हो रहा है।  
 
साठ के दशक में हम एचएफ-मारूत के रूप में एक बेहतरीन फाइटर विमान का लगभग विकास करने में सफल हो गए थे। एक जर्मन इंजीनियर कुर्त वाल्देमर टैंक की सेवाएं भी हासिल कर ली गई थीं लेकिन आंशिक सफलता के बाद इस परियोजना को बंद कर दिया गया क्योंकि तब सोवियत संघ से खरीदे गए मिग-21 विमानों की डिलिवरी शुरू हो गई थी। दूसरा केस एचपीटी-32 ट्रेनर विमानों का है जिनका परिचालन अचानक बंद कर दिया गया। किसी भी देश के पास उसकी जरूरत की अपनी टेक्नोलॉजी होनी ही चाहिए। भविष्य की लड़ाइयों में तीनों सेनाओं की जरूरतें भी एक जैसी होंगी। इसके लिए अगले दस वर्षों में जो कुछ कदम उठाने चाहिए वे इस प्रकार हैं:
 
पहला, नौसेना की तरह अन्य दोनों सेनाओं में भी प्रवेश स्तर पर अधिकारियों को इंजीनियरिंग का ज्ञान होना चाहिए और उन्हें विचारों और रणनीतिक प्रक्रिया की समझ होनी चाहिए। 
 
दूसरा, पिछले चार वर्षों में 1 लाख 27 हजार 500 करोड़ रुपये मूल्य के 150 काँट्रेक्ट दिए गए और 2 लाख 79 हजार 950 करोड़ रुपये मूल्य के 164 प्रस्तावों को एओएन यानी एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी मंजूर की गई। रक्षा खरीद के लिए पूंजीगत बजट सामान्यत: जीडीपी का 0.5 प्रतिशत रहता है। यदि हमें रक्षा के क्षेत्र में आत्म-निर्भरता के लक्ष्य को हासिल करना है तो हमें धीरे-धीरे पूंजीगत खर्च की राशि जीडीपी की 0.5 फीसदी से बढ़ा कर 1.75 तक ले जानी होगी और आर एंड डी पर खास ध्यान देना होगा। 
 
तीसरा, हमारी सेनाओं को भी स्वदेशी रक्षा सामग्री की खरीद बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए और इसके लिए लंबी अवधि की योजना तैयार करनी चाहिए। कुछ लोग समझते है कि लंबी अवधि की समेकित दृष्टिकोण योजनाएं  (longtermintegrated perspective plans-LTIPP)  वित्तीय अधिकारों और तय समयावधि के अभाव में महज खामखयाली से ज्यादा कुछ नहीं है। इस स्थिति को बदलना होगा। रक्षा उत्पादन में स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप की नीति को भी प्राथमिकता से लागू करना जरूरी है।
 
चौथा, रक्षा मंत्रालय और रक्षा उत्पादन विभाग की खरीद शाखाओं का विलय किया जाना चाहिए। दोनों ही शाखाएं अलग-अलग प्राथमिकताओं पर काम करती हैं लेकिन उनका उद्देश्य एक ही होता है। एकीकृत ढांचे में तकनीकशाहों (टेक्नोक्रेट्स) का एक स्थायी कैडर गठित करने पर भी विचार करना चाहिए। 
 
पांचवां, ड्रोन, मिसाइलें, नेटवक केन्द्र और सेनाओं की स्पेस कमानें भविष्य के युद्धों में बड़ी भूमिका निभाएंगी। तीनों सेनाओं को अपनी टेक्नोलॉजी की जरूरतों का पुनरीक्षण करना चाहिए। अमेरिकी डिफेंस एडवांस्ड रिसर्च प्रोजेक्ट्स एजेंसी (DARPA) की तर्ज पर हमें भी ऐसी ही एक एजेंसी गठित करनी चाहिए। DARPA में 140 टेक्नोलॉजी विशेषज्ञों का समूह काम करता है। इस समूह के आधे लोग विभिन्न रक्षा उद्योगों से आते हैं जो भविष्य की टेक्नोलॉजी पर काम कर रहे हैं। 
 
अंतिम और सबसे जरूरी, रक्षा उत्पादन में प्रभावी स्वदेशीकरण और भविष्य की लड़ाइयों के लिए आवश्यक टेक्नोलॉजी को समय पर शामिल करने के लिए योग्य नेतृत्व की निरंतरता जरूरी है। हमें एलसीए, पनडुब्बियों आदि परियोजनाओं की प्रगति पर नजर रखने के लिए एक रार्ष्टीय स्तर की निरीक्षण टीम गठित करनी चाहिए और इस टीम में हर प्रोजेक्ट के लिए कुशल लोगों को शामिल किया जाना चाहिए। ऐसी टीम का सीधा संपर्क राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी और रक्षा मंत्रालय से होना चाहिए। ऐसे ही कुछ ठोस उपायों के जरिए न केवल स्वदेशी रक्षा उत्पादों को बढ़ावा मिलेगा बल्कि रक्षा निर्यात का मार्ग और भी प्रशस्त हो सकेगा। '
 
(लेखक एयरोनॉटकल सोसायटी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष, हिन्दुस्तान एयरोनॉटिकल लिमिटेड के पूर्व अध्यक्ष तथा पवनहंस हेलीकॉप्टर्स के पूर्व सीएमडी हैं।) 

Tags:

रक्षा सामग्री,गलियारों,नवोन्मेष,हस्तांतरण,रक्षा सेनाओं,फाइटर विमान,एचएफ-मारूत

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