Tuesday 17 September 2019, 05:56 PM
ब्रिटेन के गले की फाँस बना ब्रेक्जिट
By प्रमोद जोशी | Bharat Defence Kavach | Publish Date: 5/17/2019 3:08:00 PM
ब्रिटेन के गले की फाँस बना ब्रेक्जिट

यूरोपीय यूनियन के 28 देशों में एक ब्रिटेन भी है। यूरोपीय यूनियन देशों के बीच आवाजाही के लिए न वीजा और न ही वर्क परमिट की जरूरत होती है। इन देशों की साझा मुद्रा भी यूरो कहलाती है। लेकिन इस यूनियन में रहते हुए भी ब्रिटेन ने अपनी मुद्रा पौंड को यूरो से अलग रखा। ब्रिटेन यूरोपीय यूनियन में रहते हुए भी ज्यादा संतुष्ट नहीं लगा। ब्रिटेन के वे लोग जो यूरोपीय यूनियन से ब्रिटेन को अलग करने के पक्षधर हैं, उनका तर्क है कि तमाम यूरोपीय देशों के लोग ब्रिटेन में बसकर वहां की अर्थव्यवस्था को कमजोर कर रहे हैैं और सामाजिक सुरक्षा सहायता का लाभ उठाते हैं। वे ब्रिटेन को फिर एक बार ग्रेट ब्रिटेन बनाना चाहते हैं। लेकिन जो ब्रिटिश नागरिक यूरोपीय यूनियन में रहना चाहते हैं, उनका मानना है कि यूनियन से अलग होने पर ब्रिटेन को यूरोप के एक बड़े बाजार से हाथ धोना पड़ेगा। इससे पौंड की कीमत गिरेगी और अर्थव्यवस्था कमजोर होगी। आज ब्रेक्सिट का मसला ब्रिटेन के गले की फांस बन गया है।

यूरोपीय संघ और ब्रिटेन के अलगाव यानी ब्रेक्जिट का मसला करीब दो महीने की गहमागहमी के बाद 31 अक्तूबर, 2019 तक के लिए टल गया है। यदि इसके पहले ब्रिटिश संसद इस अलगाव से जुड़े किसी प्रस्ताव को स्वीकार कर लेगी तो यह उससे पहले भी हो सकता है। बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स में 11 अप्रैल को यूरोपीय यूनियन के नेताओं की शिखर वार्ता के बाद इस मसले को छह महीने आगे बढ़ाने का फैसला किया गया ताकि ब्रिटिश संसद ठंडे दिमाग से कोई फैसला करे। सारा मामला करीब-करीब हाथ से निकल चुका था, पर ब्रिटिश संसद ने अंतिम क्षणों में हस्तक्षेप करके इस अनिश्चय को रोक लिया है। गत 4 अप्रैल को अंतत: एक वोट के बहुमत से संसद ने यह फैसला किया कि यूरोपीय यूनियन (ईयू) के साथ हुई संधि के अनुच्छेद  50 को लागू करने की तारीख बढ़ाई जाए ताकि बगैर किसी समझौते के ब्रेक्जिट की सम्भावना को टाला जा सके। 
 
सरकार की अनिच्छा के बावजूद यह प्रस्ताव 312 के मुकाबले 313 वोटों से पास हो गया है। इसे लेबर सांसद वेट कूपर और कंजर्वेटिव ओलीवर लेटविन ने पेश किया था। इस विधेयक को यदि हाउस ऑफ लॉर्ड्स से भी स्वीकृति मिली तो इसे स्वीकृति मिलना अनिवार्य हो जाएगा। इसका एक मतलब यह है कि बगैर डील के ब्रेक्जिट नहीं होगा। इसके अलावा इस बिल के पास होने का मतलब है कि ब्रेक्जिट में होने वाले विलम्ब की अवधि अब संसद तय करेगी। यानी कि अब प्रधानमंत्री संसद के सामने अनुच्छेद 50 की अवधि बढ़ाने का प्रस्ताव पेश करेंगी। उस अवधि में बदलाव अब संसद के हाथों में होगा। उसके बाद प्रधानमंत्री इस बात की सूचना ईयू को देंगी। यदि ईयू की कोई दूसरी राय होगी तो प्रधानमंत्री को फिर से संसद के पास आना होगा। 
 
कॉमन सभा में एक के बाद एक कोशिशों के बावजूद वह तरीका उभरकर नहीं आ रहा है, जिससे ब्रिटेन और यूरोपीय यूनियन का अलगाव ठीक-ठाक तरीके से हो सके। प्रधानमंत्री टेरेसा मे ने ईयू की सहमति से जो समझौता (ब्रेक्जिट) तैयार किया था, उसे और उसके बाद उसमें सुधार की कोशिशों को संसद बार-बार अस्वीकार करती चली गई तो आखिरी उम्मीद सोमवार 1 अप्रैल की बैठक में थी, जिसमें कम से कम चार प्रस्ताव ऐसे थे, जिनमें आगे की राह बताई गई थी। यह बैठक भी व्यर्थ हुई। चारों में से एक को भी संसद ने स्वीकार नहीं किया। इनमें कस्टम यूनियन और नॉर्वे जैसी व्यवस्था, ब्रिटेन को सिंगल मार्केट (एक बाज़ार) में बरक़रार रखने पर भी मतदान हुआ, लेकिन किसी भी विकल्प को स्वीकृति नहीं मिली। यह मतदान कानूनन बाध्यकारी नहीं था। किसी प्रस्ताव को बहुमत मिल भी जाता तो सरकार उसे मानने के लिए बाध्य नहीं होती, पर उससे रास्ता खुलता। 
 
जिस विकल्प पर निकटतम सहमति बनी, वह यह था कि ब्रिटेन ईयू की कस्टम्स यूनियन में बना रहे। यह प्रस्ताव भी तीन वोट से पराजित हो गया। जिस प्रस्ताव को सबसे ज्यादा वोट मिले, वह था कि इन प्रस्तावों पर जनमत संग्रह करा लिया जाए, पर वह भी 292 के मुकाबले 280 वोटों से गिर गया। सरकार इन दोनों ही प्रस्तावों से असहमत थी। ईयू से हटने के बाद ईयू की कस्टम्स यूनियन में बने रहने का मतलब था व्यापारिक समझौते करने की स्वतंत्रता को खोना। दूसरे प्रस्ताव का मतलब था कि 2016 के इस वायदे से मुकरना कि जनमत संग्रह का फैसला लागू होगा।
 
बगैर डील के ब्रेक्जिट!
 
इस गहमागहमी की वजह से पौंड स्टर्लिंग की कीमत गिरने लगी है। तमाम कारखानों में काम रुका हुआ है, क्योंकि पता नहीं कि अब सप्लाई किस तरह होगी और टैक्स प्रणाली किस तरीके से काम करेगी। किसी समझौते के साथ अलगाव हुआ, तब तो व्यवस्थित तरीके से सब कुछ होने की उम्मीद है, पर यदि यह बगैर किसी डील के हुआ तो फिर अराजकता का बोलबाला होगा। सब चाहते हैं कि यह अलगाव 23 मई से होने वाले यूरोपीय संसद के चुनावों के पहले हो जाए। अंदेशा इस बात का भी है कि टेरेसा मे की सरकार भी गिर सकती है।   
 
इसके पहले शुक्रवार 29 मार्च को ब्रिटिश संसद ने यूरोपीय संघ से बिना किसी समझौते के अलग होने के सरकारी प्रस्ताव को तीसरी बार ख़ारिज कर दिया था। प्रधानमंत्री टेरेसा की योजना के अनुसार 29 मार्च को यह अलगाव हो जाना चाहिए था। इसके लिए उन्होंने ईयू के साथ बातचीत करके अलग होने की औपचारिकता को पूरा करने के लिए एक समझौते का प्रस्ताव तैयार किया था, जिसे संसद ने अस्वीकार कर दिया था। इसके बाद उन्होंने एक और प्रस्ताव पेश किया, जिसे भी स्वीकार नहीं किया गया।
क्या हुआ था समझौता?
 
यूरोपीय संघ के सदस्यों ने रविवार 25 नवम्बर, 2018 को ब्रेक्जिट समझौते को मंजूरी दी थी। करीब 20 महीने के विचार-विमर्श के बाद हुए इस समझौते को ईयू के 27 नेताओं ने इस संक्षिप्त बैठक में स्वीकार कर लिया। पर ब्रिटिश संसद से इसकी पुष्टि सबसे बड़ा काम था, जो पूरा नहीं हो पाया। ईयू के नेताओं ने आगाह कर दिया था कि यदि इसे संसद स्वीकार नहीं करेगी तो हम किसी नए समझौते की पेशकश नहीं करेंगे। टेरेसा मे ने भी कहा है कि कोई दूसरा समझौता नहीं। 
 
नवम्बर में टेरेसा मे ने समझौता करने के बाद ब्रसेल्स में हुए संवाददाता सम्मेलन में कहा, कुछ बातें स्पष्ट हैं। एक, आवागमन की स्वतंत्रता पूरी तरह सबके लिए समाप्त हो जाएगी। दो, यूके की संवैधानिक एकता की रक्षा होगी। तीन, हमारे देश में लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए प्रतिनिधि जो कानून बनाएंगे और ब्रिटिश अदालतें जिनका अर्थ-ज्ञापित करेगी, वही लागू होंगे। उन्होंने यह भी कहा कि जिब्राल्टर यूके परिवार से अलग नहीं होगा। इस मसले पर स्पेन के साथ अंतिम क्षणों तक विवाद होता रहा। स्पेन के दक्षिण में स्थित यह छोटा सा इलाका सन 1713 की उत्रेख्त संधि के बाद ग्रेट ब्रिटेन का हिस्सा बना था। ईयू के इस फैसले में किसी प्रकार का मत-विभाजन नहीं हुआ था, क्योंकि ईयू के फैसले आम सहमति से होते हैं।
 
कैसे होगा विभाजन?
 
इस समझौते के तहत ब्रिटेन ने ईयू ब्लॉक के बजट के सिलसिले में अपनी प्रतिबद्धताओं की पूर्ति के लिए 50 अरब यूरो के भुगतान पर सहमति व्यक्त की थी। इसके अलावा, यूके अपने यहाँ रहने वाले ईयू के तकरीबन 30 लाख नागरिकों के कानूनी अधिकारों की रक्षा की गारंटी देता। दूसरी तरफ ईयू देशों में रह रहे तकरीबन 13 लाख यूके के नागरिकों के अधिकारों की गारंटी दी जाती। समझौते में यह भी कहा गया था कि उत्तरी आयरलैंड (जो कि यूके का हिस्सा है) और आयरलैंड गणराज्य (जो कि ईयू का सदस्य है) के बीच फिर से कोई भौतिक सीमा नहीं खींची जाएगी। आयरलैंड के साथ भौतिक सीमा रेखा न खींचने का मतलब था कि संधिकाल गुजर जाने के बाद यूके अनंत काल तक ईयू के कस्टम्स दायरे में रहेगा। यानी कि सीमा-पार व्यापार पर टैक्स नहीं लगता। व्यापारी लोग इस प्रस्ताव पर खुश थे, और कट्टरपंथी ब्रेक्जिटवादी नाराज। यह क्या बात हुई, हम अनंतकाल तक ईयू की कस्टम्स यूनियन में क्यों रहेंगे?
 
ब्रिटेन के इस असमंजस से पूरे यूरोप में अनिश्चय है। यूरोपीय संघ के अध्यक्ष डोनाल्ड टस्क का कहना है कि ब्रिटिश सरकार के पास चार विकल्प हैं। एक, डील के साथ अलग होना, दूसरा, बिना कोई डील के अलग होना, तीसरा, एक लम्बा स्थगन (यानी ब्रेक्जिट की कोई लम्बी तारीख तय कर दी जाए) और चौथा, धारा 50 को रद्द करना शामिल है। धारा 50 को रद्द करने का मतलब है ब्रेक्जिट को खारिज करना। पर इसका मतलब होगा जनमत संग्रह के फैसले को खारिज करना। ऐसा सम्भव नहीं। वह तभी सम्भव है, जब कोई नया जनमत संग्रह हो। 
राजनीतिक असमंजस
 
सरकार दोबारा जनमत संग्रह करवाने का फैसला कर सकती है पर वह भी अपने आप नहीं होगा। उसके लिए भी संसद की अनुमति चाहिए। टेरेसा मे इस संभावना से इनकार कर चुकी हैं। उनका कहना है कि इसके लिए संसद के भीतर सहमति बना पाना काफी मुश्किल होगा। अगर संसद ऐसा फैसला कर भी ले, तो भी जनमत संग्रह तत्काल नहीं हो सकता। इसके लिए चुनाव और जनमत संग्रह एक्ट-2000 के नियमों का पालन करना होगा। इस मुद्दे पर देश में वक्त से पहले चुनाव कराए जा सकते हैं। यह काम भी प्रधानमंत्री अपनी इच्छा से नहीं करा सकतीं। इसके लिए उन्हें संसद में दो तिहाई सदस्यों के समर्थन की जरूरत होगी। 
 
भारत पर असर
 
ब्रिटेन ने कोई अंतिम फैसला जल्दी नहीं किया, तो इसका असर ब्रिटिश अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। उसकी उत्पादन क्षमता गिरेगी और उसकी करेंसी में गिरावट आएगी। यूरोपियन यूनियन (एव) से 29 मार्च को ब्रिटेन के बाहर निकलने को लेकर अनिश्चतता समाप्त हो चुकी है। पौंड में उतार-चढ़ाव का भारत से ब्रिटेन को फलों और सब्जियों के एक्सपोर्ट पर असर पड़ सकता है। पर अंतत: फायदा होगा। इस वक्त भारत से यूरोपीय यूनियन को होने वाले एक्सपोर्ट का सबसे बड़ा हिस्सा ब्रिटेन जाता है। भविष्य में हमें यूरोपीय यूनियन और यूके के साथ अलग-अलग रिश्ते बनाने होंगे। भारतीय निर्यातकों को उम्मीद है कि ब्रिटेन के ईयू से हटने पर उन्हें दक्षिणी यूरोप से प्रतिस्पर्धा नहीं करनी पड़ेगी। भारत में आम का मौसम है। भारत से आम का आयात करने में ब्रिटेन दूसरे स्थान पर है। यूके के अंतरराष्ट्रीय कारोबार विभाग के अनुसार, साल 2017 में भारत और यूके के बीच कुल 18 अरब पौंड का कारोबार हुआ, जो 2016 से 15 फीसदी अधिक था।
 
कई भारतीय कंपनियां जिन्होंने पिछले कुछ सालों में ब्रिटेन में भारी निवेश किया है, वे बहुत सावधानी से स्थितियों का अध्ययन कर रहीं हैं। भारतीय कंपनियां ब्रिटेन को यूरोपीय संघ के प्रवेश द्वार के रूप में देखती रही हैं। ब्रिटेन में 800 से ज्यादा भारतीय कंपनियां हैं, जो 1,10,000 लोगों को रोजगार देती हैं। इनमें से आधे से अधिक लोग केवल टाटा समूह की ही पांच कंपनियों में काम करते हैं। टाटा समूह ब्रिटेन में सबसे बड़े विदेशी निवेशकों में से एक है। 'नो-डील ब्रेक्जिट' की स्थिति में इन कंपनियों पर सीधा असर पड़ेगा और हजारों लोगों की नौकरी चली जाएगी।
 
पिछले कुछ साल में ब्रिटेन में कई भारतीय कंपनियां बढ़ी हैं। टाटा मोटर्स (जैगुआर लैंड रोवर), टाटा स्टील, टीसीएस, हिंडाल्को, मदरसन सुमी, भारत फोर्ज, भारती एयरटेल, टेक महिंद्रा, सिमेंस फार्मा, बीएएसएफ और अरबिंदो फार्मा,रोल्टा, भारती एयरटेल और एजिस आउटसोर्सिंग जैसी कंपनियाँ इनमें शामिल हैं। 
 
टाटा समूह पूरे यूरोप में सबसे ज्यादा नौकरियां देता है। फार्मा सेक्टर में भारतीय व्यापार ब्रिटेन में बढ़ा है। पौंड के कमजोर होने पर उनके राजस्व पर बुरा असर पड़ेगा। बड़ी संख्या में दक्षिण एशियाई लोगों ने ब्रेक्जिट के समर्थन में वोट दिया था, क्योंकि ईयू से अलग होने के पक्षधरों ने उन्हें पूर्व कॉमनवैल्थ देशों से प्रतिभा के आसान स्थानांतरण का आश्वासन दिया था।  भारतीय रेस्तरां मालिकों से कहा गया था कि ईयू से अलग होने के बाद वे ज्यादा शैफ ला पाएंगे। पर यदि ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा और बड़ी संख्या में नौकरियां गईं तो स्थानीय लोगों का गुस्सा गैर यूरोपीय लोगों पर फूटेगा।
 
दूसरी तरफ, भारत यूरोपीय संघ के साथ भारत के व्यापार समझौते के अवसर भी बनेंगे। भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) वार्ता 2013 में उस समय रुक गई थी जब छह साल तक वार्ता करने के बाद भी दोनों पक्ष किसी समझौते पर पहुंचने में नाकाम रहे थे। ब्रेक्जिट के बाद ईयू के साथ एफटीए वार्ता फिर से शुरू करने का मौका मिल सकता है। यों भी ईयू और भारत के बीच व्यापार पिछले एक दशक में दुगना हुआ है। ईयू 2017 में 85 अरब यूरो के व्यापार के साथ भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार रहा है। यों भारत ईयू का नौवां सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। यूरोपीय देश, खासतौर पर जर्मनी और फ्रांस भारत को आकर्षित कर रहे हैं। अगर ब्रिटेन व्यवस्थित तरीके से ईयू से अलग होगा, तब भारत को दोनों के साथ व्यापार सम्भावनाएं तलाशनी होंगी। '

ब्रेक्जिट क्या है?
 
ब्रेक्जटि शब्द अंग्रेजी वाक्यांश 'ब्रिटिश एक्ज़टि' (यानी ब्रिटेन का यूरोपीय संघ से अलग होना) का संक्षिप्त रूप है। यूरोपीय संघ (ईयू) यूरोप के 28 देशों का राजनीतिक और आर्थिक संघ है। यूरोपीय संघ के विकास की पृष्ठभूमि को अलग से समझना होगा। मोटे तौर पर इतना समझ लें कि सन 1993 की मा्ट्रिरख्ट संधि के बाद इस संघ ने व्यावहारिक शक्ल ली। उसके पहले यूरोपीय समुदाय के रूप में एक व्यवस्था थी, जिसमें यूके 1973 में शामिल हुआ था। सत्तर के दशक में देश के वामपंथी दल यूरोपीय समुदाय से अलग होने की माँग भी करते रहे थे। इसके बाद नब्बे के दशक में कुछ दक्षिणपंथी दलों ने भी ऐसी माँग शुरू कर दी। हाल के वर्षों में युनाइटेड किंगडम में माँग की जा रही थी कि इस संघ से हमें अलग हो जाना चाहिए। यह माँग उठती रही और सन 2015 के चुनाव में कंजर्वेटिव पार्टी ने वादा किया कि इस सवाल पर जनमत संग्रह कराएंगे। इसके बाद प्रधानमंत्री डेविड केमरन ने इस माँग पर फैसला करने के लिए देश में 23 जून 2016 को जनमत संग्रह कराया, जिसमें 52 फीसदी लोगों ने अलग होने की माँग का समर्थन किया।  

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