Friday 20 September 2019, 07:37 AM
गोपनीयता के लिए ए-सैट परीक्षण पर चकमा देना जरूरी था- जी. सतीश रेड्डी
By सुशील शर्मा | Bharat Defence Kavach | Publish Date: 8/20/2019 5:35:14 PM
गोपनीयता के लिए ए-सैट परीक्षण पर चकमा देना जरूरी था- जी. सतीश रेड्डी
डीआरडीओ अध्यक्ष डॉ.जी. सतीश रेड्डी

रक्षा अनुसंधान व विकास विभाग के सचिव और डीआरडीओ अध्यक्ष डॉ.जी. सतीश रेड्डी से खास बातचीत

* तैयारी बताई बीएमडी परीक्षण की, किया ए-सैट परीक्षण!

* बाहरी ताकतों को पता चल जाता तो कई अड़चनें पैदा हो सकती थीं

* हाइपरसोनिक वाहन का परीक्षण इसी वर्ष फिर होगा

देश की रक्षा सेनाओं के लिए नए रक्षा उपकरणों, प्रणालियों और समाधानों के लिए रक्षा अनुसंधान व विकास संगठन (डीआरडीओ) पांच दशकों से भी ज्यादा समय से जुटा हुआ है। डीआरडीओ के कारण विदेशी हथियार निर्माता अपने सामान की बाजू-मरोड़ कीमत नहीं वसूल पाते क्योंकि उन्हें पता है कि यदि उन्होंने ज्यादा लालच किया तो डीआरडीओ सस्ते में भारत में ही समकक्ष उत्पाद विकसित कर सकता है। डीआरडीओ ने देश को तेजस जैसा लड़ाकू विमान देने के साथ ही अर्जुन टैंक, अवॉक्स विमान, पृथ्वी, अग्नि शृंखला के घातक मिसाइलों के अलावा अस्त्रा, ब्रह्मोस, आकाश, नाग, धनुष, बैलेस्टिक मिसाइल सिस्टम, के-4 परमाणु मिसाइल और उपग्रहनाशक ए-सैट मिसाइलें दी हैं। जिन तकनीक का डीआरडीओ में विकास किया जाता है, उन्हें उत्पादन के लिए सैंकड़ों निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनियों को हस्तांतरित किया जाता है ताकि देश में हथियारों के निर्माण का आधार बने और देश इस मामले में आत्मनिर्भर हो। डीआरडीओ के प्रयासों से सरकार के मेक इन इंडिया अभियान को बल मिल रहा है। 

डीआरडीओ की प्रयोगशालाओं में आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस, भविष्य के स्मार्ट हथियारों, अत्याधुनिक मीडियम लड़ाकू विमान (AMCA), हाइपरसोनिक वाहन आदि का विकास किया जा रहा है। इसके अलावा कठिन हालात में तैनात जवानों के लिए भोजन, स्वास्थ्य व तनाव कम करने के लिए इसकी लाइफ साइंसेस प्रयोगशालाओं ने कई उत्पाद विकसित किए हैं जिनमें से कुछ नागरिकों के उपयोग में भी आ रहे हैं।  डीआरडीओ संवेदनशील कार्यक्रमों में अत्यंत गोपनीयता बरतता है ताकि विकसित की जा रही टेक्नोलॉजी की भनक बाहरी दुनिया को न लग सके। गत माार्च में सफलतापूर्वक संपन्न किया गया मिशन शक्ति उपग्रहनाशक मिसाइल का परीक्षण अत्यंत गोपनीयता के साथ पूरा किया गया था। 

डीआरडीओ की मौजूदा अनुसंधान व विकास परियोजनाओं तथा भविष्य के कार्यक्रमों के बारे में 'डिफेंस मॉनिटर' के संपादक सुशील शर्मा ने रक्षा अनुसंधान व विकास विभाग के सचिव और डीआरडीओ अध्यक्ष डॉ.जी. सतीश रेड्डी से बातचीत की। प्रस्तुत है बातचीत के प्रमुख अंश:

- गत मार्च में डीआरडीओ ने उपग्रहनाशक मिसाइल (Anti-Satellite-A-SAT) का पहला और सफल परीक्षण किया जिससे हर देशवासी गौरवान्वित महसूस कर रहा है। यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस सफलता की स्वयं टीवी पर आ कर घोषणा की। क्या इस परीक्षण से जुड़े कुछ अनुभव साझा करेंगे?

मिशन शक्ति ए-सैट एक अत्यंत गोपनीय कार्यक्रम था। डीआरडीओ पिछले कई वर्षों से बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस टेक्नोलॉजी (हमलावार बैलिस्टिक मिसाइल को रास्ते में ही ध्वस्त करने की क्षमता) पर काम रहा है। प्रधानमंत्रीजी ने इस कार्यक्रम की समीक्षा की थी और उन्होंने  सितम्बर 2016 में हमें Anti-Satellite (A-SAT) मिसाइल कार्यक्रम को आगे बढ़ाने का निर्देश दिया। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार श्री अजित डोवाल इस कार्यक्रम पर नजर रखे हुए थे। हमने उपलब्ध टेक्नोलॉजी में कुछ महत्वपूर्ण सुधार करते हुए सिर्फ दो वर्षों में एंटी सैटेलाइट मिसाइल बना ली। इस दौरान जिस उपग्रह को नष्ट करना था, हमने उसकी गति, ऊंचाई, मार्ग, व्यवहार आदि पर गहरी नजर रखी। अचूक गणना की गई। ऐसा करना इसलिए जरूरी था कि यदि मिसाइल छोड़ने में कुछ सेकेंड की देरी हो जाती तो उपग्रह अपनी कक्षा में आगे बढ़ जाता और मिसाइल उसे हिट नहीं कर सकती थी। सारी बातें अनुकूल हो गईं तब 27 मार्च 2019 को निर्धारित समय पर इसका अत्यंत सफल परीक्षण किया गया। मिसाइल ने धरती से लगभग 280 कि.मी. की ऊंचाई पर चक्कर लगा रहे देश के ही एक सक्रिय उपग्रह को नष्ट कर दिया। मिसाइल की मार इतनी अचूक थी कि उसने उपग्रह के ज्यामितीय केन्द्र बिन्दु से सिर्फ 10 सें.मी. से भी कम दायरे में हिट किया। परीक्षण में इस बात का पूरा ध्यान रखा गया कि लक्ष्यित उपग्रह के मलबे से अंतरिक्ष में मौजूद अन्य उपग्रहों को कोई नुकसान नहीं पहुंचे। यह परीक्षण देश के लिए गर्व का क्षण था। 

- क्या आप इस परीक्षण से जुड़े कुछ अनुभव साझा करेंगे?

इस कार्यक्रम से हमारे 250-300 लोग जुड़े हुए थे लेकिन हम क्या परीक्षण करने जा रहे हैं, इसकी जानकारी सिर्फ 4-5 लोगों को थी। बाकी लोगों को यही बताया गया कि यह एक हाई अल्टीट्यूड इंटरसेप्शन यानी काफी ऊंचाई पर किसी मिसाइल को रोकने का परीक्षण होगा। एक तरह से अन्य लोगों को यह पता था कि हम एक बार फिर बैलेस्टिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम (BMD)का परीक्षण करने जा रहे हैं लेकिन वास्तव में हम करने जा रहे थे पहली एंटी-सैटेलाइट मिसाइल का परीक्षण। इतनी गोपनीयता बरतना इसलिए जरूरी था क्योंकि किसी अनधिकृत व्यक्ति को इस परीक्षण की जरा भी भनक लग जाती तो कई तरह के बाहरी और आंतरिक ताकतों से कई अड़चनें आ सकती थी। इसलिए अत्यंत गोपनीयता के साथ चकमा देना बहुत जरूरी था। 

इस परीक्षण के लिए हमें कई असामान्य कदम उठाने पड़े जैसे शीघ्रता के मद्देनजर कई गतिविधियों को अलग-अलग करने के बजाय उन्हें एक साथ जोड़ कर समय  बचाया गया। जब सभी आवश्यकताएं पूरी हो गईं तब स्वचालित तरीके से परीक्षण किया गया जिसमें मानव हस्तक्षेप बिल्कुल नहीं था। ए-सैट क्षमता हासिल करने वाला अमेरिका, रूस और चीन के बाद भारत चौथा देश है। 

- डीआरडीओ के ही एक पूर्व प्रमुख डॉ. वी.के.सारस्वत ने कई वर्ष पहले दावा किया था कि भारत के पास एंटी-सैटेलाइट मिसाइल क्षमता है। फिर इस परीक्षण को करने में इतना वक्त क्यों लगा?

यह सही है कि हमारे पास टुकड़ों-टुकड़ों में कुछ क्षमताएं थीं। बैलेस्टिक मिसाइल डिफेंस (BMD) क्षमता तो हमारे पास थी ही। लेकिन 2016 में प्रधानमंत्रीजी का निर्देश मिलने के बाद सभी क्रियाओं और प्रणालियों को पूरी तरह तैयार किया गया और एक बिल्कुल नई मिसाइल बनाई गई। ये काम सिर्फ दो साल की अवधि में किए गए जो एक बड़ी उपलब्धि है। 

- आपने BMD का जिक्र किया, क्या हमारी BMD के रेंज को बढ़ाया जा रहा है और क्या बीवीआर मिसाइल अस्त्रा की रेंज भी बढ़ाई जा रही है?

जी हां, हम लंबी दूरी की बैलेस्टिक मिसाइल से रक्षा की इस दिशा में काम कर रहे हैं और जल्दी ही हम वांछित कामयाबी हासिल कर लेंगे। हम अस्त्रा मिसाइल की भी रेंज बढ़ाने का काम कर रहे हैं। 

- खबरों के मुताबिक डीआरडीओ में लंबे समय से मल्टीपल इंडिपेंडेंटली टोरगेटेबल री-एंट्री वेहिकल (MIRV) पर काम कर रहा है। एक साथ कई बमों को गिराने की क्षमता वाली मिसाइल वाले MIRV प्रोजेक्ट में क्या प्रगति हुई है?

डीआरडीओ में MIRV पर कोई प्रोजेक्ट नहीं चल रहा है। हां, हमारे पास ऐसी तकनीकी क्षमता जरूर है। 

- वायुसेना की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए डीआरडीओ अत्याधुनिक मीडियम लड़ाकू विमान (AMCA) का विकास कर रहा है। यह विमान परीक्षणों के लिए कब तक तैयार हो जाएगा और क्या इस विमान का निर्माण कार्य एचएएल करेगा?

AMCA प्रोजेक्ट अभी डिजाइन के चरण में हैं। यह पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान है जिसमें कई स्टेल्थ खूबियां होंगी। इस परियोजना पर रक्षा अनुसंधान व विकास विभाग की प्रयोगशाला एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (ADA) में काम चल रहा है। हमारी कोशिश है कि हम अगले पांच वर्षों में इस स्वदेशी आधुनिक लड़ाकू विमान को परीक्षण उड़ान के लिए तैयार कर लेंगे। फिलहाल इसमें अमेरिकी जीई-414 इंजन लगाने की योजना है लेकिन बाद में इसकी ताकत बढ़ाने के लिए स्वदेशी या विदेशी कम्पनी के सहयोग से और भी शक्तिशाली इंजन देश में तैयार किया जाएगा। हमारी कोशिश है कि हम इसका विकास देश में ही करें। यह विमान एचएएल बनाएगा या कोई और कम्पनी, इस पर अभी कोई फैसला नहीं लिया गया है। 

- गत जून में डीआरडीओ ने एक हाइपरसोनिक वाहन का परीक्षण किया था जो सफल नहीं रहा। अब इसका अगला परीक्षण कब होगा?

हमने क्षमता प्रदर्शन के रूप में स्क्रैमजेट इंजन वाले हाइपरसोनिक वाहन का परीक्षण किया था। प्रक्षेपण सफल था और हमने कई तकनीकों को इस परीक्षण में प्रमाणित किया। लेकिन पूर्ण सफलता के लिए कुछ और परीक्षण करने हैं।अगला परीक्षण इसी वर्ष के अंत तक करने की योजना है। 

- डीआरडीओ भविष्य की रक्षा जरूरतों को ध्यान में रख कर भविष्य के स्मार्ट हथियारों जैसे माइक्रोवेव ई-बम और लेजर हथियारों का विकास भी कर रहा है। इस दिशा में अब तक क्या प्रगति हुई है?

भविष्य के हथियारों की टेक्नोलॉजी के विकास का काम अभी अवधारणा के स्तर पर है। उच्च ऊर्जा शक्ति युक्त इलेक्ट्रोमैग्नेटिक टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में अभी काफी रिसर्च होनी है। 

- आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस (AI) टेक्नोलॉजी आने वाले समय में युद्ध का परिदृश्य बदल देगी। विश्व के कई अग्रणी देश इस दिशा में काम कर रहे हैं और अक युक्त 'स्वार्म टेक्नोलॉजी' का विकास कर रहे हैं। डीआरडीओ में इस परियोजना पर क्या काम हो रहा है?

आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस (AI) टेक्नोलॉजी भविष्य में युद्ध के हालात समेत तमाम क्षेत्रों में भारी भूमिका निभाने जा रही है। स्वार्म टेक्नोलॉजी का चलन बढ़ेगा। डीआरडीओ स्वयं और शिक्षण संस्थानों के साथ मिल कर इस दिशा में काफी काम कर रहा है। स्वार्म टेक्नोलॉजी में नन्हें ड्रोनों का झुंड (स्वार्म) हथियारयुक्त तो नहीं होता लेकिन बिना हथियारों के भी एक बड़ा झुंड अपने लक्ष्य को भारी नुकसान पहुंचा सकता है। झंुड के ड्रोन स्वत: अपने झुंड के तमाम ड्रोनों के साथ संपर्क बनाए रहते हैं और अपने कंट्रोलर के संपर्क में भी रहते हैं। हमें उम्मीद है कि हम अगले तीन-चार साल में इस काम में काफी प्रगति कर लेंगे। 

- सेना के अलावा पुलिस और अर्ध सैनिक बलों के लिए किन उपकरणों का विकास किया जा रहा है?

हमने आंतरिक सुरक्षा के जवानों के लिए बुलेट प्रूफ जैकेट, विशेष जूते, बैकपैक, प्लास्टिक बुलेट, ग्रेनेड, मिर्च ग्रेनेड,सेंसर आदि विकसित किए हैं। अभी हमने सुरक्षा बलों के लिए कॉर्नरशॉट गन विकसित की है जो परीक्षणों के लिए तैयार है। डीआरडीओ द्वारा विकसित मिर्च ग्रेनेड तेजपुर में एक निजी कम्पनी के अलावा हमारी भी प्रयोगशालाएं बना रही हैं। 

- डीआरडीओ देश में रक्षा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के लिए उद्योगों को टेक्नोलॉजी हस्तांतरण की दिशा में क्या प्रयास कर रहा है?

डीआरडीओ बड़े पैमाने पर भारतीय उद्योग के साथ सहयोग कर रहा है। अभी तक हमने भारतीय उद्योगों को 800 से ज्यादा टेक्नोलॉजी का हस्तांतरण किया है। हमने मिसाइल लाँच कंप्यूटर सिस्टम, मिसाइल सब-सिस्टम, रेडार सब-सिस्टम तोप, बारूदी सुरंग और एवियॉनिक्स जैसी टेक्नोलॉजी हस्तांतरित की है। हम सार्वजनिक उपक्रमों के अलावा 1500 से ज्यादा निजी कम्पनियों से जुड़े हैं। हम लघु, छोटे, मझोले और बड़े उद्योगों को रक्षा के क्षेत्र में बढ़ावा दे रहे हैं। हम चाहते हैं कि जो कम्पनियां अभी उप-प्रणालियां बना रही हैं, वे आगे चल कर प्रमुख प्रणालियां बनाएं। '  

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डीआरडीओ,लाँच कंप्यूटर सिस्टम,लड़ाकू विमान,उपग्रहनाशक,मिसाइल,गोपनीयता

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