Thursday 21 March 2019, 11:10 PM
एक हिंसक दुनिया में आजाद हुआ था भारत
By प्रख्यात राजनयिक महाराज कृष्ण रसगोत्रा | Bharat Defence Kavach | Publish Date: 1/3/2019 4:04:11 PM
एक हिंसक दुनिया में आजाद हुआ था भारत
राजनयिक महाराज कृष्ण रसगोत्रा

राजनयिक महाराज कृष्ण रसगोत्रा से खास बातचीत (भाग-2)

राजनयिक महाराज कृष्ण रसगोत्रा से सुशील शर्मा की एक लंबी बातचीत का पहला भाग 'डिफेंस मॉनिटर' के पिछले अंक (अक्तूबर,नवम्बर-2018) में प्रकाशित किया गया था। इस अंक में प्रस्तुत है बातचीत का दूसरा भाग जिसमें उन्होंने कई रोचक तथ्यों को उजागर किया है। 

1962 की हार के बाद टूट गए थे नेहरू  

'नेपाल हमारा दोस्त कभी नहीं होगा'

चीन के साथ 1962 की हार के बाद नेहरूजी की मानसिक स्थिति कैसी थी?

उस दौरान मैं मिला था उनसे। उस समय मैं विदेश मंत्रालय में उत्तरी क्षेत्र में 'वॉर बुक ऑफिसर' था। उस पराजय के बाद पंडितजी टूट गए थे। अब वह वो पंडित नेहरू नहीं थे जिन्हें हम पहले देखते थे। कभी-कभी उन्हें जब जोश आता था, वह हाथ में एक डंडा लेकर कहते थे, 'अब मैं चीनियों के साथ इस डंडे से लड़ूंगा'। चीन ने उनके साथ धोखा किया था। लेकिन अब वह कभी भारत पर हमले की हिम्मत नहीं कर सकता। 

उस दौरान रक्षा मंत्री कृष्णमेनन ने कई काबिल कमांडरों के साथ दुर्व्यवहार किया था। क्या उसका भी जंग पर असर पड़ा?

वी.के.कृष्ण मेनन के साथ रसगोत्रा 

 

मेनन तुनक मिजाज और बड़बोले इंसान थे। मेरे साथ भी शुरू में उनसे अन-बन रहती थी। मैं अमेरिका में पोस्टेड था, एक दिन मैंने उनसे कह दिया कि यदि आपको मेरा काम पसंद नहीं है तो मैं दिल्ली लौट जाता हूं। लेकिन वह समझ गए थे कि मैं काम का आदमी हूं, लिहाजा उसी शाम अचानक मेरे घर आए और मेरी बीवी को फूलों का गुलदस्ता दिया और मेरे खिलाफ शिकायत की कि तुम्हारा शौहर मुझसे बात नहीं करता, दिल्ली लौटना चाहता है। जिस पर उन्हें भरोसा होता था, उसके प्रति वह आदर का भाव रखते थे। उनका दिमाग बहुत तेज था लेकिन जो उनका मिजाज था, वह रक्षा मंत्री बनने के काबिल नहीं था। 

आपने कई प्रधानमंत्रियों के साथ काम किया है। क्या बताएंगे कि इनमें से हरेक की क्या खूबियां थी?

पंडित नेहरू की तमाम आलोचनाओं के बावजूद मैं उनकी पूजा करता हूं। अंतरराष्ट्रीय राजनय की जानकारी रखने के कारण मैं यह कह सकता हूं कि पंडितजी जैसा भव्य व्यक्तित्व यदाकदा ही धरती पर जन्म लेता है। वह ईमानदारी से शांति के पक्षधर थे और देश के गरीबों को लेकर चिंतित रहते थे। उन्होंने पूरे देश की यात्रा कर स्थिति को समझ रखा था। भारत को लेकर उनका सोचना था कि यदि यह मुल्क तरक्की करेगा तो बहुत बड़ा मुल्क बन जाएगा लेकिन गिरावट पर आएगा तो गिर जाएगा। 

आठ सौ साल की गुलामी में भारत गिरावट पर ही तो था। कोई एक मुल्क थोड़े ही था। अंग्रेजों ने तमाम रजवाड़ों को आजाद कर अगल-अलग मुल्क में भारत को बांटने की साजिश की थी। नेहरू जी का विचार था कि यदि वह देश को गरीबी से निकाल सके तो पैसा भी आ जाएगा और हम हथियार भी बना लेंगे। देश में हथियार बनाने की उनकी नीति थी। नेहरूजी की नीतियां तो ठीक थी लेकिन उनकी यह विचारधारा कि दुनिया में सभी लोग अच्छे हैं, पाकिस्तान भी भद्रलोगों का देश है,अंग्रेज भी शरीफ हैं; लेकिन वास्तव में ऐसा था नहीं । 

जवाहर लाल नेहरू और कृष्ण मेनन 

 

भारत एक हिंसक दुनिया में आजाद हुआ था। ब्रिटेन, अमेरिका, चीन, पाकिस्तान आदि मुल्क हमारे खिलाफ थे। सोवियत संघ भी हमें लेकर दुविधा में था। यहां तक कि इंडोनेशिया जिसके शासक सुकर्णों को हमने बचाया था, वह भी बदल गया और पाकिस्तान का साथ देने लगा। भारत के विशाल आकार को लेकर ये तमाम मुल्क ईर्ष्यालु थे। 

मैं पहली बार नेहरू जी से लाहौर में तब मिला था जब स्टूडेंट लीडर था। उन्होंने पूछा, 'क्या कर रहे हो?' मैंने बताया कि मैं इंग्लिश में एमए कर रहा हूं और आगे चल कर पढ़ाना चाहता हूं। लेकिन जब मैं विदेश सेवा में आ गया और पहली बार उनसे मिलने गया, तो उन्होंने मुझे देख कर पूछा, 'हम कहां मिले थे?' वह मुझे पहचान गए थे। उन्होंने कहा कि तुम तो पढ़ाना चाहते थे? इस पर मैंने कहा कि सर, 'मैंने तीन साल पढ़ाया है'। ट्रेनिंग के बाद मुझे असिस्टेंट चीफ प्रोटोकोल ऑफिसर बनाया गया और जब भी कोई विदेशी नेता भारत आता था, मुझे उसके साथ मदद के लिए लगा दिया जाता था। मेरा अक्सर नेहरूजी के घर आना-जाना रहता था। एक बार ब्रिटिश प्रधानमंत्री हेरॉल्ड मैक्मिलन भारत आए। मुझे उनके साथ लगा दिया गया। एक दिन नेहरूजी ने पूछा, 'क्या तुम मैक्मिलन की पब्लिक मीटिंग में गए थे?' मैंने कहा कि साहब मैं उनकी हर मीटिंग में जाता हूं। उन्होंने पूछा, 'क्या किसी ने मैकमिलन को हजूर, माई-बाप तो नहीं कहा?' मैंने कहा कि सर, किसी ने नहीं कहा, लोग उनको नहीं, बल्कि आपको हजूर, माई-बाप कहते हैं!

मैंने उन्हें एक और किस्सा सुनाया। एक पब्लिक मीटिंग हुई थी हरियाणा में कहीं। लेकिन तब हरियाणा पंजाब का हिस्सा था। काफी लोग आए थे। पंजाब के एक मंत्री ने मैक्मिलन का परिचय कराया कि यह सज्जन हेरॉल्ड मैक्मिलन है, कंजरवेटिव पार्टी के नेता और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री है। इस पर छात्रों के एक समूह ने जोर से टोका, 'ब्रिटेन के प्राइम मिनस्टर तो जवाहर लाल नेहरू हैं!' नेहरूजी खूब हंसे और पूछा, 'मैक्मिलन को बुरा तो नहीं लगा?' मैंने कहा कि सर, वह भी जोर-जोर से हंस रहे थे! इतने लोकप्रिय थे नेहरूजी जनता में! 

प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को 1965 की जंग के  दौरान उनको आपने कैसा पाया?

जब पाकिस्तान ने भारत पर हमला किया और बात काफी आगे बढ़ गई, तब एक दिन मैं उनके साथ जा रहा था। उन्होंने मुझे कहा कि रसगोत्राजी अब तो पाकिस्तान हमें जंग पर मजबूर कर रहा है। मैंने भी उन्हें कहा कि साहब अब हमारे पास जंग के अलावा और विकल्प भी नहीं है। वह चुप हो गए और सोच में पड़ गए। लेकिन उसी रात उन्होंने पंजाब में अंतरराष्ट्रीय सीमा पार कर लाहौर पर हमले का हुक्म दे दिया। हमने लाहौर की नहर के पुल पर कब्जा कर लिया था और लगभग लाहौर पहुंच गए थे। लाहौर के लोग घर छोड़ कर भागने लग गए थे। शकरगढ़ पर कब्जा कर लिया था। सियालकोट भी दूर नहीं था। 

शास्त्रीजी को दिल की बीमारी तो थी ही। वे दिन भी काफी तनावपूर्ण थे। ताशकंद समझौते पर उन्होंने मन मार कर हस्ताक्षर किए थे। हाजीपीर का जीता हुआ इलाका हमें छोड़ना पड़ा। यह गलत हुआ। इस बारे में मैंने तत्कालीन विदेश सचिव सी.एस.झा से बात की कि क्यूं हमने रणनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण उस इलाके को छोड़ा? झा साहब ने बताया कि हम उनकी जमीन पर कब्जा नहीं करना चाहते थे और राजस्थान का एक रेगिस्तानी इलाका पाकिस्तान के कब्जे में था। लिहाजा हमें हाजीपीर छोड़ना पड़ा। 

इंदिराजी के साथ आपके अनुभव कैसे रहे?

इंदिराजी के दौर में तो मैं विदेश सचिव था। उनसे मेरी जान-पहचान 1950 से थी। जब वह प्रधानमंत्री बनी तब हम औपचारिकता और सम्मान के साथ बात करते थे। उससे पहले हम उन्हें 'इंदु बहन-इंदु बहन' कहा करते थे। अब हम 'मैडम प्राइम मिनिस्टर' कहने लगे। मैं उनके पूरे परिवार को जानता था। 

इंदिराजी के साथ रसगोत्रा 

 

जब वह प्रधानमंत्री बनीं तब मैं विदेश मंत्रालय में डायरेक्टर (नॉर्थ) था। नेपाल, भूटान, सिक्किम आदि देशों को डील करता था। एक दिन उन्होंने मुझे बुलाया और इन देशों के बारे में जानकारी ली। मैंने नेपाल के बारे मेें उन्हें बताया कि मैडम हमारे लोग मानते हैं कि नेपाल एक हिन्दू राष्ट्र है लिहाजा हमारा मित्र देश है। लेकिन मेरे विचार में हम नेपाल पर भरोसा नहीं कर सकते। उन्होंने पूछा कि क्यों? नेपाल हिन्दू राष्ट्र तो है। इस पर मेरा जवाब था, 'ंमैडम, इतिहास बताता है कि हिन्दुओं ने हिन्दुओं को मरवाया है। जयचंद ने मोहम्मद गौरी से मिल कर पृथ्वीराज को मरवाया था। ऐसा ही मुसलमान भी करते रहे हैं। बंगाल में मीर कासिम को मरवा दिया मीर जाफर ने।' जहां तक भूटान की बात है, उनकी एक संस्कृति है, उन्हें स्वतंत्र छोड़ देना चाहिए लेकिन सिक्किम को काबू करना होगा। सिक्किम के महाराजा ने एक अमेरिकी लड़की से शादी कर ली थी और वह अपने देश को संयुक्त राष्ट्र में ले जाना चाहता है। 

जब भी नेपाल का कोई नेता या प्रधानमंत्री आता था, तो वह मुझे भी मीटिंग में बैठा लेती थीं। एक दिन नेपाल के एक नेता के बारे मेें उन्होंने मुझे कहा कि देखो, यह व्यक्ति मुझे कुछ कहता है, लेकिन इनकी नीति बिल्कुल उलट है। नेपाली नेता कहते कुछ हैं, और करते कुछ हैं। तुम ठीक कहते थे, इनसे दुश्मनी नहीं करनी है लेकिन भरोसा भी नहीं करना है। मैंने उन्हें कौटिल्य नीति से बताया कि पड़ोसी देश कभी दोस्त नहीं होंगे। नेपाली हमसे दुश्मनी तो नहीं कर सकेंगे लेकिन ये बात दिमाग में रखनी होगी कि नेपाल हमारा दोस्त नहीं होगा। जब मैं विदेश सचिव बना तो हफ्ते में दो दिन सुबह नौ बजे सबसे पहले मीटिंग मेरे साथ होती थी। 

अमेरिका राष्ट्रपति निक्सन से उनके संबंध अच्छे नहीं थे। 1971 के युद्ध से पहले वह एक बार अमेरिका गई थीं और निक्सन से साफ कह दिया था कि लाखों शरणार्थियों का बोझ भारत नहीं उठा सकता। आप पाकिस्तानी तानाशाह याह्या खां को समझाए। निक्सन ने गोलमोल जवाब दिया। यह अमेरिका की पाकिस्तान से मिलीभगत थी। 

राजीव गांधी के साथ काम करने का अनुभव कैसा था? 

राजीव के साथ मैंने सिर्फ तीन महीने काम किया और फिर 1985 में रिटायर हो गया। जब वह प्रधानमंत्री बने तो पहले ही हफ्ते में उन्होंने मुझे बुला कर विदेश नीति की जानकारी ली। मैंने उन्हें तमाम स्थिति समझाई और नेपाल के बारे में बताया। 

श्रीलंका में तमिल हिंसा जारी थी। उसकी जानकारी दी। श्रीलंका के बारे में मैंने उन्हें समझाया कि श्रीलंका हमारा मित्र देश है। वहां तमिल अलगाववादी हिंसा हो रही है और श्रीलंका कठिन स्थिति में है। तमिलों का स्वतंत्र राष्ट्र बनना हमारे हित में नहीं होगा। लिहाजा हमें दोनों पक्षों को बातचीत के जरिए समस्या का समाधान निकालने की कोशिश करनी चाहिए। हमें सीधे हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। वह मेरी बात से सहमत थे लेकिन मेरे रिटायर होने के बाद ही उन्होंने श्रीलंका में सेना भेज दी। मैंने उन्हें एक चिट्ठी लिखी कि प्रधानमंत्रीजी आप ने सेना भेज तो दी है। 

प्रधानमंत्री राजीव गांधी और श्रीलंका के राष्ट्रपति जे.आर.जयवद्धने ने 29 जुलाई 1988 को कोलंबो में भारत-श्रीलंका समझौते पर हस्ताक्षर किए थे 

 

सेना का जाना तो आसान है लेकिन वहां से निकलना कठिन होगा। इस बात से वह मुझसे काफी नाराज हो गए थे। कभी किसी पार्टी में आमना-सामना होता तो वह मेरे से मुंह फेर लेते थे। राजीव कान के कच्चे थे, अनुभव भी नहीं था। जब वह विपक्ष में आए तो उन्होंने अपनी गलतियों को समझना शुरू कर दिया था। यदि वह दूसरी बार प्रधानमंत्री बनते तो बहुत अच्छे प्रधानमंत्री होते। '

  फ्रांस के राष्ट्रपति ने क्यों टाला मोरारजी का निमंत्रण?

रसगोत्रा ने बताए राजीव-बेनजीर और जियाउल हक से जुड़े रोचक किस्से

रसगोत्राजी, एक राजनयिक या राजदूत के रूप में किसी विदेशी हस्ती के साथ बीता कोई रोचक वाकया याद है?

जी हां, यह बात संभवत: मार्च 1979 की है। मुझे फ्रांस में राजदूत नियुक्त किया गया था। तब फ्रांस के राष्ट्रपति थे वरेली जिसकार डेएस्ते। क्रिडेंन्शल समारोह के बाद राष्ट्रपति के साथ कुछ देर बातें होती रहीं। चर्चा यूरोप के किसी मुद्दे पर चल रही थी। इस बीच मैंने उनसे कहा कि आप यूरोपीय देश कुछ अर्सा पहले तक दुनिया पर राज करते रहे और विशेष रूप से फ्रांस की विदेश नीति स्वतंत्र रही है। लेकिन आज आप अमेरिका पर निर्भर हो गए हैं और वह जैसा चाहता है आप यूरोपीय देशों के लोग वैसा ही करते हैं। मेरे विचार में यूरोपीय देशों को सोवियत संघ पर ज्यादा दबाव नहीं डालना चाहिए वर्ना वह देश यूरोप का दुश्मन हो सकता है।

मेरी बात सुन कर वह कुछ सोचने लगे। शायद उन्हें लगा होगा कि यह पहला एशियाई डिप्लोमेट है जो वैश्विक मामलों की अच्छी समझ रखता है। उन्होंने कहा,'राजदूत महोदय, मैं चाहता हूं कि आपका जब मन करे, मुझसे मिलने आ जाया करें या जब मुझे आपसे मिलने का मन करे तो क्या मैं आपको राष्ट्रपति भवन में बुला सकता हूं क्योंकि आप वैश्विक मामलों के अलावा एशिया और अपने देश के बारे में अच्छी जानकारी रखते हैं।' मैंने उनसे कहा कि आप जब चाहें मुझे बुला लीजिएगा, मुझे आपकी सेवा में आने पर खुशी होगी। 

फ्रांस के राष्ट्रपति वरेली जिस्कार डेएस्ते के साथ एम.के.रसगोत्रा 

 

कुछ ही महीनों बाद राष्ट्रपति के सचिव का फोन आया कि राष्ट्रपति महोदय आपसे मिलना चाहते हैं, वह भी अकेले। मैंने अपनी सहमति दे दी। अगले दिन मिलने का समय तय हुआ। मैं जब राष्ट्रपति के ड्राइँग रूम में पहुंचा, वह खड़े थे और मेरा इंतजार कर रहे थे। उन्होंने मुझसे कहा, 'मैं आपसे एक बहुत जरूरी बात पर सलाह लेना चाहता हूं लेकिन मैं यह बात एक राष्ट्रपति के रूप में नहीं कर रहा और न ही आप एक राजदूत के रूप में जवाब देंगे।' उनकी बात सुन कर मैं दुविधा में पड़ गया लेकिन फिर भी कहा कि ऐसा ही होगा। 

उन्होंने मुझे कहा, 'मिस्टर रसगोत्रा, आपके प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई मुझे भारत आने के लिए जोर दे रहे हैं। क्या उनकी सरकार स्थिर है? क्योंकि मेरा राजदूत तो कह रहा है कि सरकार स्थिर है लेकिन अन्य सूत्रों से विरोधाभासी खबरें मिल रही है कि मोरारजी की सरकार स्थिर नहीं है। यदि मैं उनके बुलावे पर भारत जाता हूं तो यह फ्रांस के किसी भी राष्ट्रपति की पहली भारत यात्रा होगी। ऐसे में मैं जानना चाहता हूं कि क्या उनकी सरकार टिकी रहेगी क्योंकि यदि मैं वहां जाऊं और सरकार कुछ ही समय में गिर जाए तो मेरी यात्रा फलप्रद नहीं होगी। आपकी इस बारे में क्या राय है'? 

मैंने उनसे कहा, 'मेरी जानकारी के मुताबिक मोरारजी सरकार कुछ ही महीनों में गिर जाएगी क्योंकि इस सरकार में शामिल कई नेता प्रधानमंत्री की कुर्सी पर नजर गड़ाए हुए हैं। आपसी मतभेद के कारण यह सरकार ज्यादा समय नहीं चलेगी।' उन्होंने पूछा,'यदि यह सरकार अस्थिर है तो अगला प्रधानमंत्री कौन हो सकता है?' मैंने जवाब दिया, 'निसंदेह, इंदिरा गांधी अगले चुनाव में जीत कर प्रधानमंत्री बनेंगी।' उन्होंने कहा कि तब तो मैं अभी भारत यात्रा पर नहीं जाऊंगा। लेकिन क्या ऐसा हो सकता है कि नई सरकार बनने के बाद मैं पहला विदेशी राष्ट्राध्यक्ष होऊं जो भारत की यात्रा पर आए? 

मैंने उनसे कहा कि मैं पक्के तौर पर तो नहीं कह सकता, लेकिन कोशिश जरूर करूंगा। इंदिरा गांधी उन दिनों पूरे भारत में घूम रही थीं और लोकप्रिय हो रही थीं जबकि मोरारजी सरकार का पतन शुरू हो रहा था। कुछ महीनों बाद चुनाव हुए और इंदिरा गांधी की पार्टी जीत गईं। अभी उन्होंने प्रधानमंत्री पद की शपथ नहीं ली थी कि मैंने इंदिराजी को फोन किया और कहा कि मैडम, यहां फ्रांस के राष्ट्रपति के रूप में आपके एक मित्र हैं, वह कई बार आपके बारे में मुझसे पूछ चुके हैं। उन्हें मोरारजी ने कई बार बुलाया लेकिन वह भारत नहीं गए क्योंकि उन्हें लगता था कि उनकी यात्रा निरर्थक होगी। अब वह पहले विदेशी राष्ट्राध्यक्ष के रूप में भारत आना चाहते हैं।

उन्होंने कहा कि बिल्कुल वह आ सकते हैं। आप उनसे कहिए कि वह गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में भारत आएं। मैं निमंत्रण पत्र भेज दूंगी। मैं फिर राष्ट्रपति डेएस्ते के पास गया और कहा,'महोदय, आप भारत की यात्रा पर आने वाले पहले विदेशी नेता होंगे और आपकी यात्रा साधारण नहीं होगी, आप भारत के सबसे महत्वपूर्ण समारोह गणतत्र दिवस समारोह के मुख्य अतिथि के रूप में जाएंगे।' यह सुन कर वह खुशी से उछल पड़े और मुझे लगभग गले से लगा लिया! इसके बाद हम मित्र बन गए। एक अच्छा राजनयिक वह होता है जो उस देश में जहां वह राजदूत बन कर जाता है, वहां के राष्ट्राध्यक्ष या शासनाध्यक्ष पर अपना प्रभाव छोड़े। 

जब महारानी ने राजीव व बेनजीर पर ली चुटकी!

एक वाकया और सुनाता हूं। उन दिनों मैं ब्रिटेन में भारत का उच्चायुक्त था। कुआलालंपुर में राष्ट्रकुल देशों का सम्मेलन हुआ था जहां ब्रिटेन की महारानी भी गई थीं। उन दिनों भारत में वीपी सिंह की नई सरकार आ गई थी और मैंने उच्चायुक्त पद से त्यागपत्र दे दिया था। विदाई भेंट के लिए मैं महारानी से मिलने अपनी पत्नी के साथ बकिंघम पैलेस गया। चाय-नाश्ते के बाद मैंने उनसे पूछा, 'मैडम, कुआलालंपुर में कैसी रही बैठक? सवाल सुन कर उनकी आंखों मंे शरारत आ गई। बोलीं, 'उच्चायुक्त महोदय, बैठक क्या रही? बैठक में राजीव आया नहीं और बेनजीर का दिल टूट गया!' वह एक काफी खुशमिजाज रानी हैं। 

दरअसल, राजीव और बेनजीर एक दूसरे को अच्छे से समझते थे। तब तक बेनजीर समझ गई थी कि कश्मीर की रट लगाने का कोई फायदा नहीं है, लिहाजा और मामलों में दोनों देशों को रिश्ते बेहतर बनाने के लिए आगे बढ़ना चाहिए। मेरे खयाल से दोनों नेताओं में एक समझ पैदा हो गई थी। राजीव गांधी भी पाकिस्तान गए थे। दोनों कुछ अच्छा करना चाहते थे लेकिन जल्दी ही बेनजीर को सत्ता से बेदखल कर दिया गया और राजीव गांधी की सरकार चुनाव हार गई। 

जियाउल हक से यादगार मुलाकात 

मैं पहली बार विदेश सचिव के नाते जुलाई 1982 में पाकिस्तान गया। मुझे पाकिस्तान के रेजिडेंसी भवन में ठहराया गया। रेजिडेंसी भवन में मुख्यत: विदेशों के शासनाध्यक्षों को ठहराया जाता है लेकिन मुझे भी वहां ठहरा कर मेरा सम्मान किया गया। उस दिन राष्ट्रपति जनरल जियाउल हक से पहली मुलाकात मेरी ही हुई। मैंने उनसे उर्दू में कहा, 'सदर साहब, मैं लाहौर में स्टूडेंट था। यहां आकर मैं एक दिन लाहौर भी गया और वहां मेरी मुलाकात मेरे उस्ताद से हुई।' जिया ने पूछा, ' कौन?' मैंने कहा, 'सिराजुद्दीन साहब।' जिया ने कहा कि वह उनको जानते हैं। मैंने कहा कि लाहौर की काफी तरक्की हुई है। मैंने यह भी कहा कि अपकी सरकार ने रेजिडेंसी में ठहरा कर मेरा काफी सम्मान किया है। वहां तो स्टेट गेस्ट ठहराए जाते हैं। जिया ने कहा, 'सरगोत्रा साहब, ये क्या बात कर रहे हैं? आप हमारे लिए स्टेट गेस्ट ही हैं।' कुछ देर बातचीत के बाद मैंने उनसे कहा, 'साहब, मैं यहां आपके प्रेस वालों से मिला। उनमें से एक 'नवाए वक्त' अखबार के एडिटर भी थे। उन्होंने मुझे धीरे से कान में कहा कि वह अकेले में मुझ से मिलना चाहते हैं। मैंने उन्हें रेजिडेंसी में बुला लिया। 

पाकिस्तानी फौजी तानाशाह और राष्ट्रपति जियाउल हक के साथ रसगोत्रा 

 

प्रेस वालों ने मुझसे कश्मीर पर कोई बात नहीं की। न ही नवाए वक्त के एडिटर ने मुझसे कश्मीर पर कोई बात की। और मामलों पर बात हुई। लेकिन आज सुबह जब मैंने नवाए वक्त अखबार खोला तो पहली हेडलाइन थी कि मैं कश्मीर पर बातचीत के लिए यहां आया हूं। मैंने उनको अखबार दिखाया। जियाउल हक ने हंसते हुए कहा, 'कश्मीर पर क्या बातचीत करनी है? कश्मीर आपके पास है, हम उसे ले नहीं सकते। और बात करते हैं कि दोनों देशों में ताल्लुकात कैसे बेहतर हों। मैं तो अपने विदेश सचिव को यह आदेश दे रहा हूं कि शांति की बात करो।' 

जियाउल हक काफी मिलनसार व्यक्ति थे। जब मैं उनसे मिलने गया तो वह बाहर जहां कार खड़ी होती है, वहां मेरे स्वागत के लिए खड़े इंतजार कर रहे थे। गले लगे और मेरी काफी तारीफ की लेकिन वह भरोसे लायक इंसान नहीं थे।'

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