Wednesday 12 August 2020, 03:06 PM
बेटे ने अपाहिज सैनिक पिता को थप्पड़ मार कर पूछा, 'सर, मेरा बाप मर क्यों नहीं गया?'
By सुशील शर्मा | Bharat Defence Kavach | Publish Date: 12/26/2019 5:42:35 PM
बेटे ने अपाहिज सैनिक पिता को थप्पड़ मार कर पूछा, 'सर, मेरा बाप मर क्यों नहीं गया?'
सेना के एक अपाहिज जवान से बातचीत करते जनरल बिपिन रावत

जब जनरल रावत की मौजूदगी में घटी एक मार्मिक घटना

जनरल बिपिन रावत ने सैनिकों और पूर्व सैनिकों के कल्याण के लिए उठाए जा रहे कदमों की चर्चा के क्रम में एक अत्यंत मार्मिक वाकया सुनाया। उन्होंने बताया कि 2016 में वह सेना की दक्षिणी कमान के कमांडर इन चीफ थे। एक बार वह पुणे में आयोजित सेवानिवृत्त सैनिकों के एक कार्यक्रम में भाग लेने गए थे। वहां उनकी मुलाकात मराठा लाइट इंफेंन्ट्री के एक पूर्व सैनिक से हुई जो काफी बूढ़े हो गए थे। वह 1971 की जंग में रीढ़ की हड्डी में गोली लगने से अपाहिज हो गए थे। वह किसी अन्य व्यक्ति की मदद के बिना खाना भी नहीं खा सकते थे लिहाजा उनकी मदद के लिए उनका बेटा भी साथ आया था जो लगभग 45-48 साल का रहा होगा। रावत उस सैनिक के पास बैठ कर खाना खा रहे थे। पूर्व सैनिक का हाथ इतना अपाहिज था कि खाने की चम्मच उनके मुंह तक नहीं पहुंच रही थी। बेटा हाथ पकड़ कर खाने का चम्मच मुंह तक ले जाने में मदद कर रहा था। बेटे को जब जनरल रावत से बातचीत करने में व्यस्त देखा तो पिता ने स्वयं खाना खाने की कोशिश की लेकिन तीन-चार बार चम्मच मुंह तक ले जाने में असफल रहा और सारा खाना उनके कपड़ों पर गिर गया। जनरल रावत ने सैनिक के पुत्र से कहा कि वह अपने पिता को ठीक से खाना खिलाए, वह अपने कपड़े खराब कर रहे हैं। बेटे ने अपनी प्लेट एक तरफ रखी और जनरल रावत के सामने ही पिता के गाल पर एक जोरदार थप्पड़ जड़ दिया। कमांडर रावत हक्के-बक्के रह गए। उन्होंने पिता पर हाथ उठाने वाले व्यक्ति से ऐसी गुस्ताखी करने का कारण पूछा। जिस पर उस व्यक्ति ने कहा, 'सर, मेरा बाप मर क्यों नहीं गया?' उसने कहा, 'सर, मेरा बाप 1971 की जंग में जख्मी हो कर अपाहिज हो गया। घर का सारा खर्च इनकी पेंशन से चलता था। धीरे-धीरे हालात इतने खराब हो गए कि हमने घर चलाने के लिए जमीन बेचनी शुरू कर दी। दूसरी ओर, इन्हीं का एक साथी भी उसी मराठा लाइट इंफेन्ट्री में था। वह उसी जंग में शहीद हो गया। उसके परिवार को न केवल सरकार ने कुछ जमीन दी बल्कि शहीद की पत्नी को एक पेट्रोल पंप मिला, बेटे को सेना में नौकरी मिल गई और वह परिवार आज एक अच्छे मकान में रहता है। दोनों एक साथ उस जंग में गए थे। एक बच गया लेकिन अवहेलना के कारण कंगाली के कगार पर है, दूसरा शहीद हो गया लेकिन आज उसका परिवार काफी संपन्न है। इसीलिए मैं पूछता हूं, 'मेरा बाप मर क्यों नहीं गया?'

जनरल रावत ने बताया कि कई साल पहले शहीद के परिवार को जमीन, पेट्रोल पंप और नौकरी दी जाती थी लेकिन घायलों को बस अपाहिज पेंशन दे कर घर भेज दिया जाता था। उस घटना ने मुझे अंदर तक हिला दिया और जब मैं जनरल बना तब पूर्व सैनिकों के कल्याण की योजना बनाने लगा। ऐसे ही एक सैनिक अपाहिज हो चुके सैनिक से उनकी मुलाकात पठानकोट में हुई। एक सिख जवान था। करगिल युद्ध में घायल होने से वह दोनों पांव से अपाहिज हो गया। उसी युद्ध में सेना के एक अफसर ने भी दोनों पांव गंवा दिए थे। उस सिख सैनिक ने मुझसे पूछा, 'सर, क्या जंग में एक ही तरह से अपाहिज हुए जवान और अफसर को पेंशन देने में रैंक का फर्क देखा जाता है?' इस सवाल ने भी उन्हें काफी विचलित किया। वह सोचने लगे कि क्या ऐसे सैनिकों के पेंशन में पांच गुना तक का अंतर होना चाहिए? जनरल रावत ने तय किया कि सौ फीसदी अपाहिज हो चुके सैनिकों के साथ न्याय करने में अब देरी नहीं होनी चाहिए। भले ही इस भारी अंतर को पूरी तरह समाप्त न किया जा सके, लेकिन इसे कम करने के प्रयास होने ही चारिए। इसे ध्यान में रखते हुए ऐसे सैनिकों का डाटा एकत्रित किया गया है और आज हमारे पास समुचित डाटा है जिसके आधार पर हम पूर्व सैनिकों और विशेष रूप से विकलांग हो गए सैनिकों के कल्याण के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाने जा रहे हैं। इसके लिए रक्षा मंत्री से भी बात की है। यही कारण है कि हमने पिछले साल को 'इयर ऑफ डिजेबल्ड' घोषित किया था।

जनरल रावत ने बताया कि सिर्फ उन्ही सैनिकों के परिवारों पर दुख का पहाड़ नहीं टूटता जो युद्ध में शहीद होते हैं, उन सैनिकों के परिवारों का भी ध्यान रखना जरूरी है जो किसी दुर्घटना, डयूटी को दौरान निधन या किसी अन्य परिस्थिति में जान गंवा बैठते हैं। इस बात को ध्यान में रखते हुए सेना ने इस साल को 'नेक्स्ट ऑफ किन' (NoK) परिजनों का वर्ष घोषित किया है। हम ऐसे सैनिक परिवारों का कष्ट दूर करने की दिशा में भी कदम उठाने जा रहे हैं।

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