Wednesday 30 September 2020, 03:12 PM
यूएवी की बढ़ती उपयोगिता: भारत की उपलब्धियां और नीतिगत खामियां
By सुशील शर्मा | Bharat Defence Kavach | Publish Date: 8/6/2020 1:49:09 PM
यूएवी की बढ़ती उपयोगिता: भारत की उपलब्धियां और नीतिगत खामियां

आज के दौर में किसी भी जंग में उन हथियारों और प्रणालियों की भूमिका काफी महत्वपूर्ण हैं जो चतुर (स्मार्ट) और मानवरहित हों। इनके कारण युद्ध का स्वरूप ही बदल गया है। अब आसमान में लड़ाकू पायलटों की 'डाग फाइट' का रोमांचक दौर समाप्त हो रहा है क्योंकि अब 100-150 कि.मी. दूर उड़ रहे दुश्मन के विमान को बियाँड विजुअर रेंज मिसाइलों की मदद से गिराया जा सकता है। लिहाजा आमने सामने लड़ने की नौबत ही नहीं आएगी। स्मार्ट वेपन में लेजर गाइडेड रॉकेट और मिसाइलें, मानवरहित विमान, मानव रहित लड़ाकू विमान, माइक्रोवेव वेपन आदि हथियार और जंगी प्रणालियां हैं जिनकी मदद से दूर बैठ कर दुश्मन को भारी नुकसान पहुंचाया जा सकता है।

इन तमाम आधुनिक रक्षा साधनों में मानव रहित विमान (यूएवी) की भूमिका दिनों दिन बढ़ती जा रही है। टोह और निगरानी के बाद खाड़ी के युद्ध में पहली बार यूएवी की जंगी भूमिका सामने आई। इराक के खिलाफ युद्ध हो या ओसामा बिन लादेन जैसे आतंकियों के खिलाफ लड़ाई, ऐसे यूएवी जिन्हें आम भाषा में ड्रोन कहा जाता है, ने काफी घातक भूमिका निभाई। लेकिन विशेषज्ञ ड्रोन शब्द को जंगी यूएवी के लिए सही नहीं मानते। उनका तर्क है कि ड्रोन उस पुरुष मधुमक्खी का नाम है जिसके डंक नहीं होता जबकि जंगी यूएवी काफी घातक होते हैं। इसलिए इन्हें रिमोटली पायलेट एयरक्राफ्ट यानी आरपीए कहा जाना चाहिए। भारत और अमेरिका में ऐसे ड्रोनों को आरपीए ही कहा जाता है। इसके अलावा इन्हें अनमैन्ड काँबेट एरियल व्हीकल यानी यूसीएवी भी कहा जाता है। लेकिन यूसीएवी की परिकल्पना ऐसे ड्रोन के लिए की जाती है  जिसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस हो, जो उड़ान भरने से लेकर उतरने, हवा में स्वयं अपने लक्ष्य का संधान करने, खुद को सुरक्षित रखने और सुरक्षित डाटा लिंक के प्रसारण में सक्षम हो। इस लिहाज से अभी किसी भी देश के पास यूसीएवी सेनाओं में उपलब्ध नहीं है। फिर भी, नॉथ्रप ग्रुमन का पेगासस या जनरल अटोमिक्क का प्रिडेटर आरपीए वर्ग में आते हैं जो अपने हथियारों से दुश्मन के इलाके में तबाही मचा देते हैं। इन्हें अनमैन्ड एयरक्राफ्ट सिस्टम (यूएएस) भी कहा जाता है, यूएवी की महत्ता को देखते हुए दुनिया भर के तमाम देश इनके विकास में जुटे हुए हैं और भारत में भी इनका विकास हो रहा है। भारत में भी अन्य देशों की तरह यूएवी का इस्तेमाल सैन्य और नागरिक उपयोग में बढ़ता जा रहा है। सेना, अर्ध सैनिक बलों के अलावा परिवहन और व्यापारिक कार्यों में इनकी बढ़ती भूमिको को देखते हुए भारत बड़ी संख्या में इन्हें हासिल करने के प्रयास कर रहा है। इसके लिए देश में अनुसंधान और विकास का काम हो रहा है और जहां इस काम के नतीजे आने में देरी हो रही है, वहां इनका आयात भी किया जा रहा है।

भारत की इन्हीं जरूरतों और इस में पैदा हो रही चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए हाल ही में एक अति महत्वपूर्ण पुस्तक प्रकाशित हुई है जिसका शीर्षक है, 'इंडियाज क्वेस्ट फॉर यूएवी एंड चैलेंजेस'। इसके लेखक हैं, भारतीय वायुसेना के ग्रुप कैप्टन आर.के.नारंग। पुस्तक के कुल नौ अध्याय हैं जिनमें यूएवी के विकास का इतिहास, जंगी यूएवी (यूसीएवी) का विकास और चुनौतियां; अनियंत्रित वायुक्षेत्र में यूएवी को शामिल करना; चीन में यूएवी विकास के स्तंभ, उड्डयन क्षेत्र का परिवेश, सहयोग और चोरी की टैक्नोलॉजी; आधुनिक यूएवी निर्माण में चीन के बढ़ते कदम, वैश्विक व क्षेत्रीय फलितार्थ; पाकिस्तान का यूएवी स्वदेशीकरण कार्यक्रम; यूएवी टैक्नोलॉजी हासिल करने में भारत के प्रयास; भारत में एविएशन डिजाइन, विकास और उत्पादन संबंधी चुनौतियां और भारत में मजबूत उड्डयन उद्योग के लिए जरूरी उपाय।

जनरल अटोमिक्स का एमक्यू-9बी सीगार्जियन ड्रोन

भारत ने यूएवी क्षेत्र में काफी देर से कदम रखा लेकिन जल्दी ही इस दिशा में ठीक-ठाक प्रगति की है। भारत में लक्ष्य संधान के लिए पहली बार पायलट विहीन विमान बनने लगे। भारत अब माइक्रो, मिनी और हाई अल्टीट्यूट और मीडियम लाँग एंड्यूरेंस (HALE/MALE) यूएवी बनाने में जुटा है। टार्गेट, माइक्रो, मिनी, टैक्टिकल और MALE यूएवी क्रमश: देश को इस क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर ले जाएंगे।

अभ्यास यूएवी

फिर भी भारत की सैन्य जरूरतें आयातित यूएवी पर ही निर्भर हैं। ऐसा दूरगामी नीति के अभाव में हो रहा है। सेना के अलावा केन्द्रीय पुलिस बल, एनडीएमए और व्यापारिक कार्यों के लिए भी यूएवी की मांग बढ़ रही है।

 विमान बनाने में भारत का अनुभव काफी पुराना है। रक्षा उपक्रम हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लि. 1951 में एचटी-2ट्रेनर, 1058 में पुष्पक, 1959 में कृषक, 1964 में एचजेटी-16, 1964 में ही मारुत फाइटर, 1972 में बसंत, 1975 में अजित, 1976 में किरण माक-2, 1977 में एचटी-32 ट्रेनर, 1984 में एचटीटी-34, 1992 में एडवांस्ड लाइट हेलीकॉप्टर, 2001 में हल्का लड़ाकू विमान तेजस, 2010 में लाइट काँबेट हेलीकॉप्टर और 2016 में लाइट यूटीलिटी हेलीकॉप्टर बनाए। डीआरडीओ ने कापोथका (1987), नेत्रा (2007), निशांत (2008), पंछी (2014), रुस्तम-1(2010) और रुस्तम-2(2016) जैसे यूएवी विकसित किए। नेशनल एयरोस्पेस लेबोरेटरी (एनएएल) हंसा और सारस जैसे विमान के अलावा माइक्रो और मिनी यूएवी विकसित किए हैं। इन सबके बावजूद भारत यूएवी के क्षेत्र में अभी आत्मनिर्भर नहीं हो सका है। खास तौर से सैन्य उपयोग के टोही या जंगी यूएवी के मामले में विशेष प्रगति नहीं हुई है। क्षमता है कौशल्य है लेकिन नीतिगत खामियों ने रफ्तार धीमी कर दी है।

आज भारत के लिए दो स्तर पर काम करते हुए यूएवी टैक्नोलॉजी पर महारत हासिल करने की कोशिश होनी चाहिए। पहली, स्थानीय उद्योग और शिक्षण संस्थानों को आर्थिक और ढांचागत सुविधाएं देने के लिए कदम उठाए जाएं। दूसरी, यूएवी उद्योग को प्रोत्साहित करने के लिए उड्डयन संबंधी तमाम नीतियों में भारी सुधार होने चाहिए। यूएवी मामले में भारत की औद्योगिक नीति यह है कि औद्योगिक नीति और संवर्धन विभाग उन निजी क्षेत्र के उद्योगों को जिनके पास ग्राहक यानी सेना या अन्य सरकारी अमले द्वारा यूएवी खरीदने का पत्र हो। अन्य उद्योग चाह कर भी यूएवी विकास नहीं कर पाते। यूएवी के लिए उद्योगों को न कोई परीक्षण उपलब्ध है और न ही निजी परीक्षण स्थल बनाने की इजाजत है। इससे इस क्षेत्र में काम करने वाले उद्योगों के हाथ बंधे हुए हैं। हवाई क्षेत्र प्रबंधन मामले में डीजीसीए नीतियों में सुधार की बात तो मानता है लेकिन जमीन पर कोई खास काम नहीं हो रहा। पुस्तक के अध्याय 'रोडमैट फॉर ए रोबस्ट एविएशन इको सिस्टम इन इंडिया' में समस्याओं को दूर करने के लिए कई महत्वपूर्ण समाधान भी सुझाए गए हैं।

 

नेत्रा डीआरडीओ यूएवी

जिन पाठकों को आधुनिक युग में यूूएवी से संबंधित तकनीकी और नियामक जानकारी में रुचि है, उनके लिए यह पुस्तक अत्यंत ज्ञान वर्धक होगी।

पुस्तक में बताया गया है कि पहले और दूसरे विश्व युद्ध के बीच के काल में यूएवी के विकास में तेजी आई थी लेकिन तब इनकी भूमिका को खास तवज्जो नहीं मिली। तब के कमांडर पारंपरिक हवाई लड़ाई पर ही ज्यादा भरोसा करते थे। पहला यूएवी डा. पीटर कूपर और एल्मर ए. स्पेरी ने अमेरिकी नौसेना के एक एन-9 कर्टिस ट्रेनर विमान को अपने स्वचालित गायरोस्कोपिक स्टेबिलाइजर की मदद से यूएवी में बदला था। यह मानव रहित विमान 300 पाउंड के बम ले कर 50 मील दूर तक गिरा सकता था लेकिन प्रथम विश्व युद्ध में इसका इस्तेमाल नहीं हुआ। इसके बाद लगातार अमेरिकी विशेषज्ञों ने घातक यूएवी का विकास किया जो ज्यादा असरदार तरीके से टोही और निगरानी का काम करने के साथ ही बमों से लैस भी होते थे। इस बीच नवंबर 1944 तक जापान ने भी हाइड्रोजन भरे गुब्बारों के रूप में अपने यूएवी तैयार किए। जापान ने ऐसे करीब 9000 गुब्बारे अमेरिका की दिशा में छोड़े। कई गुब्बारे अमेरिका तक पहुंचे भी लेकिन इनसे कोई खास नुकसान नहीं हुआ और रणनीति के तहत अमेरिका ने जो भी नुकसान हुआ उसका ढिंढोरा इसलिए नहीं पीटा कि इससे जापान का हौसला न बढ़े।

दूसरे विश्व युद्ध के बाद यूएवी के प्रति रुझान घटता-बढ़ता रहा। सेनाएं यूएवी को जंगी भूमिका के बजाय लक्ष्य संधान के प्रशिक्षण लिए पसंद करने लगे। ऐसे यूएवी पर लड़ाकू विमान लक्ष्य लगाते और अपने हुनर को निखारते थे। इस बीच अमेरिका और तत्कालीन सोवियत संघ के बीच शीतयुद्ध छिड़ चुका था। अमेरिका की योजना ऐसा यूएवी बनाने की थी जो सोवियत संघ पर परमाणु बम के साथ जा गिरे और भारी नुकसान पहुंचाए। लेकिन यह योजना सिरे नहीं चढ़ी। इसके बाद अमेरिका ने पायलट चालित यू-2 जासूसी विमान बनाया जो 70,000 फीट की ऊंचाई पर उड़ान भर सकता था। अमेरिका ने ऐसा एक विमान सोवियत संघ की जासूसी के लिए पाकिस्तान से उड़ाया। अमेरिका को यकीन था कि इतनी ऊंचाई तक मार करने के लिए सोवियत संघ के पास कोई मिसाइल नहीं होगा लेकिन उस विमान को सोवियत संघ ने मार गिराया और उसके पायलट फ्रांसिस गैरी पावर्स को जीवित पकड़ लिया। दो वर्ष बाद 1962 में अमेरिका का एक और यू-2 विमान सोवियत संघ समर्थित क्यूबा पर मार गिराया गया। इसमें अमेरिकी पायलट मेजर रुडोल्फ एंडरसन जूनियर मारा गया। इससे अमेरिका की काफी बदनामी हुई। इन घटनाओं के बाद अमेरिका ने ऐसे यूएवी विकसित करने का काम तेज किया जिनमें किसी मानव जीवन की हानि की आशंका न रहे। अमेरिका ने बेड़े हटाए गए विमानों को मानव रहित विमानों में बदलना शुरू किया और एफ-104 स्टारफाइटर पहला ऐसा विमान था जिसे क्यूएफ-104 मानव रहित विमान के रूप से तब्दील किया गया।

बाद में अमेरिका ने कोरिया और वियतनाम युद्धों में दुश्मन के ठिकानों की टोह लेने के लिए मानव रहित विमानों का खूब इस्तेमाल किया। वियतनाम के खिलाफ युद्ध में चीन वियतनाम का साथ दे रहा था। इसलिए अमेरिका ने अपने मानव रहित विमान चीन के ऊपर भी उड़ाए। चीनीयों ने एक अमेरिकी यूएवी को मार गिराया और खूब प्रचार किया जिससे अमेरिका का गोपनीय यूएवी कार्यक्रम उजागर हो गया।

पुस्तक में एक रोचक जानकारी यह भी है कि 1973 में मिस्र और सीरिया के खिलाफ इजरायल की लड़ाई के दौरान इजरायल के पास अपना कोई यूएवी नहीं था। उसने अमेरिका से यूएवी लेकर युद्ध में इस्तेमाल किए। ऐसा ही 1982 में बेका वेली की लड़ाई में भी हुआ। लेकिन बाद में इजरायल ने अपने यूएवी विकसित किए और 1996 तक उसने सर्चर और हेरोन जैसे यूएवी भारत को निर्यात भी कर दिए।

आज अमेरिका के पास पेगासस, एमक्यू-9 जैसे अत्यंत घातक यूएवी हैं जो टोही और संघारक भूमिका निभाते हैं।

पुस्तक में बताया गया है कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद यूएवी के विकास का काम तीन चरणों में हुए। पहले चरण में तैयार किए गए यूएवी ज्यादा चतुर नहीं थे और उनका इस्तेमाल विमानभेदी तोपों और लड़ाकू विमानों के लिए लक्ष्य संधान का अभ्यास करने के लिए किया जाता था। दूसरे चरण में यू-2 जैसे यूएवी टोही और जासूसी कार्य के लिए विकसित किए गए। तीसरे चरण में विकसित किए गए यूएवी हथियारों से लैस और घातक अभियानों को पूरा करने के काम में आए। ऐसे यूएवी को आम भाषा में यूसीएवी यानी अनमैन्ड काँबेट एरियल व्हीकल कहा जाने लगा। यूसीएवी के विकास में आज उत्तरोत्तर तेजी आ रही है और इन्हें ज्यादा से ज्यादा चतुर बनाने की होड़ लगी है। कोशिशें हो रही हैं कि आधुनिक यूसीएवी स्वंय उड़ान के दौरान सामने आने वाले खतरों से खुद को सुरक्षित रखते हुए अभियान को सफलता से साथ पूरा कर सकें।

नागरिक उड्डयन की अंतरराष्ट्रीय संस्था इकाओ ने यूएवी के लिए ऐसे क्षेत्र की इजाजत दी है जो नागरिक और सैन्य उड्डयन क्षेत्र से अलग हो। इसे नान-सेग्रिगेटेड एयरस्पेस कहा जाता है। धीरे धीरे यूएवी को भी सेग्रिगेटेड हवाई क्षेत्र में शामिल करने की नीतियों पर विचार हो रहा है। यूएवी सिर्फ सैन्य कार्य के लिए ही नहीं बल्कि नागरिक व्यापार के भी उपयोगी साधन बनते जा रहे हैं।

पुस्तक में इस बात की भी अच्छी जानकारी दी गई है कि चीन ने किस तरह अपने यूएवी कार्यक्रम को बढ़ावा दिया। आम धारणा कि चीन टैक्नोलॉजी की चोरी करता है या रिवर्स इंजीनियरिंग करता है के विपरीत पुस्तक में बताया गया है कि किस तरह चीन ने यह सब करने के साथ ही शिक्षण संस्थानों और अपने एयरोस्पेस उद्योग को बढ़ावा देते हुए इस कार्यक्रम को आगे बढ़ाया है। चीन के यूएवी कार्यक्रम में वहां के उद्योग के साथ ही उच्च शिक्षण संस्थानों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसी तरह पाकिस्तान ने भी इस क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के प्रयास तेज किए हैं। इसमें चीन ने भी मदद दी है लेकिन पाकिस्तान के रक्षा वैज्ञानिक भी यूएवी विकास में गंभीरता से जुटे हुए हैं।

यूएवी विषय पर यह पुस्तक आंकड़ों और जानकारियों से भरपूर है अत: संग्रहणीय पुस्तक है।

पुस्तक: इंडियाज क्वेस्ट फॉर यूएवीज एंड चैलेन्जेस

भाषा: अंग्रेजी

लेखक: ग्रुप कैप्टन आर.के. नारंग, वीएम

पृष्ठ-428

मूल्य-रु. 1520

प्रकाशक: के डब्लू पब्लिशर्स प्रा.लि., दिल्ली

समीक्षक: सुशील शर्मा

 

 

 

 

Tags:

यूएवी,ड्रोन,पायलट,टैक्नोलॉजी,मानव रहित,विमान,सीगार्जियन,जनरल अटोमिक्स,डाग फाइट,नारंग,स्मार्ट,नगरिक,उड्डयन,पुस्तक समीक्षा

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